गुरुवार, 31 अगस्त 2023

भाई मैच तो कांटे का होगा।भारत पाकिस्तान। India vs Pakistan

भाई मैच तो कांटे का होगा।भारत पाकिस्तान।

जैसा की क्रिकेट भारत के लिए एक बड़ा खेल और अब बाजार बन चुका है तो अब इस खेल में खेल के साथ साथ आक्रमकता, पैसा और गलेमर्स भी खूब जमकर देखा जा सकता है । 

जी हां दोस्तो जैसा की मेरा पसिंदा खेल भी क्रिकेट ही रहा है और वेसा ही कुछ आप के साथ भी होगा। अब में बात कर रहा हूं दो दिन पूर्व एशिया क्रिकेट कप की और उसमे होने वाले भारत पाकिस्तान मैच की।

एशिया कप करीब 1984 में प्रारम्भ हुआ था ओर इसमें 6 देश भाग लेते है जैसा कि इस कप का बुखार ही कुछ अलग किस्म का होता है क्युकी इसमें दो प्रमुख प्रतिद्वंदी भारत और पाकिस्तान आमने सामने खेलते है ओर कही बार भिडंत भी इस कप में हो चुकी है।

अब तक इस एशिया कप में 7 बार भारत और 6 बार श्री लंका कप जीत चुकी है वहीं पाकिस्तान 2011 के बाद करीब 12 साल से कप जितने के इंतजार में है ओर अबकी बार वो अभी  वर्ल्ड की प्रमुख टीम बनकर खेल रही है।

भारत पाकिस्तान के मैच पर सबकी निगाह होगी और एक तरफ विराट कोहली, रोहित शर्मा है तो दूसरी तरफ बाबर आजम ओर रिजवान जैसे प्लयेर है । एक तरफ बुमराह है तो दूसरी तरफ रउफ है। 
इन सब से इतर एक तरफ भारत किकेट टीम को पसंद करने वाले प्रशसंक है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के टीम के प्रशंसक। भाई मैच तो पूरा गजब का होगा। 

एशिया कप 2010 में दो ऐसे यादगार पल जो अभी भी लोगो को याद होगा।

#गंभीर ओर #कामरान के बीच तीखी बहस।


दरअसल 2010 में पाकिस्तान ने खेलते हुए भारत को 268 का लक्ष्य दिया था ओर भारत ने उसे 7 विकेट पर 271 का लक्ष्य 49.5 ओवर में पा कर जीत गया था और उसमें गंभीर मेन ऑफ मैच रहे थे 83 बोल में 97 ठोके थे और तब ब्रेक में पाकिस्तान के विकेटकीपर कामरान अकमल के साथ गंभीर की गजब गर्मागर्म बहस हुई थी।

#हरभजन ओर #शोएब अख्तर।

इसी मैच में हरभजन ने शोएब अख्तर के 47 ओवर में उनकी गेंद पर जबरदस्त छक्का मार दिया तो दोनों के बीस बहस होने लगी ओर फिर हरभजन ने मोहमद अमीर कि गेंद पर विजय छक्का लगाया और फिर हरभजन अख्तर की तरफ देखने लगे।......

वाकई में जबरदस्त मैच था। अब शनिवार को इंतजार रहेगा। खेल भावना से खेल होगा।

#क्रिकेट #एशिया_कप #भारत #पाकिस्तान #cricket #indiavspakistan #india #AsiaCup2023 #viratkohli #rohitsharma #jadeja

शनिवार, 12 अगस्त 2023

अनुशासन सफलता की कुंजी है।

अनुशासन सफलता की कुंजी है।
आप जो ये तस्वीर देख रहे है ये तस्वीर उन दो महान खेल के खिलाड़ियों की है जिनका अपना एक दौर था । जी हां में बात कर रहा हूं हमारे भारत के सबसे ज्यादा पसंद करने वाले खेल क्रिकेट की और उस खेल के दो महान खिलाड़ी के जीवन के उस भाग की की व्यक्ति को अपने मजबूत समय में किस तरह अनुशासन बनाए रखना होता है।

ये वो दौर था जब मुंबई के स्कूल की एक दोस्त जोड़ी ने घेरुलू क्रिकेट में धमाल करते हुए भारतीय क्रिकेट टीम में प्रवेश लिया था और इस जोड़ी की खूब चर्चा शुरू से रही ।
भारतीय क्रिकेट टीम में खब्बू लेफ्ट बैट्समैन के रूप में विनोद कांबली इस कदर क्रिकेट में खेलने लगे थे कि उन्हें एक समय में क्रिकेट की रन मशीन कहा जाने लगा था और वो देश ओर दुनिया के सब क्रिकेट पिच पर एक साल में एक हजार बना चुके थे और उनका नाम देश ओर दुनिया में होने लगा था उनकी फेन फॉलोइंग भी बढ़ने लगी थी ओर चर्चा के साथ प्रसिद्धि ओर फिर शोक मौज भी बढ़ कर बोलने लगे थे वो धीरे धीरे खेल को भूल अन्य चीजों में चर्चा में आने लगे उनके जीवन ओर खेल में अनुशासन कम होने लगा ओर एक दौर ऐसा आया कि इस महान खिलाड़ी का आखिरी ब डा मेंच आप सब को याद होगा 1996 का क्रिकेट वर्ल्ड कप और जब ये खिलाड़ी आंखो में आंसू लिए मैदान से बाहर आ रहे थे और धीरे धीरे ये खिलाड़ी गुमनामी में कई खो गया और फिर क्रिकेट में वापसी ना कर पाए।

वहीं दूसरी तस्वीर में कांबली के दोस्त सचिन तेंदुलकर की है जो कि दुनिया में क्रिकेट खेल के भगवान कहे जाने लगे । सरुआत दोनों ने साथ की थी और टीम में भी साथ आए थे और जब कांबली का बल्ला बोल रहा था तब इनका बल्ला खामोश था पर जीवन ओर खेल में अनुशासन बनाए रखा और धीरे धीरे दुनिया के हर खेल प्रेमी के जुबान पर आज सचिन का नाम है। आज उनके लाखो खेल प्रेमी है उन्होंने जीवन में खूब ऊंचाइयां छू ई पर कभी अनुशासनहीनता का समाचार हम किसी ने नहीं पढ़ा और ना ही सुना। बस आज हजारों रन बना कर एक दोस्त दुनिया का बादशाह है तो एक दोस्त नेपथ्य में जी रहा है। 

दोस्तो जीवन में अनुशासन जरूरी है आप भले ही शिखर पर हो पर अनुशासन बनाए रखे अपने जीवन ओर कार्य के प्रति तो कभी असफलता हाथ नहीं लगेगी। 

दोनो खिलाड़ी महान है बस अनुशासन ने एक को महान और एक को कम कर दिया। 

क्रिकेट। क्रिकेट_खेल

सांचौर के युवा, मौजीज और प्रबुद्ध लोग आगे आए। सांचौर जिला।

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#सांचौर के युवा, मौजीज और प्रबुद्ध लोग आगे आए। 

गलत का विरोध करे और सकारात्मक विचारों का सम्मान करे। 

निसंदेह सांचौर में जो हुआ वो आने वाले भविष्य को लेकर गहरी चिंता का विषय है। में सांचौर के युवा, वरिष्ठ और प्रबुद्ध जन से निवेदन करता हूं कि हमारा सांचौर इतना कभी बुरा नहीं था जितना कुछ अब बदला है। सच्चाई को स्वीकार कर हर समाज के वरिष्ठ, मोजीज लोग राजनीतिक से दूर होकर गलत कार्यों का विरोध करे और अपनी पीढ़ी और युवाओं को गलत रास्तों पर जाने से बचाए। 
दो दशक पहले सांचौर और आज के सांचौर को देखे तो जमीन आसमान का फर्क नजर आता है। उस दौर का सांचौर का व्यक्ति सच्चा संचोरी नजर आता था। अपने मेहनत और विपरीत हालातो में जीने की उन्हें आदत थी ओर वो आने वाली पीढ़ियों को भी यही सीख देते थे कि ये धरती कच्चे कमजोर की नहीं है यहां हर चीज के लिए मेहनत करनी पड़ेगी और सांचौर की जनता ने मेहनत के बल देश प्रदेश में नाम किया ओर सांचौर में भी आर्थिक विकास हुआ। क्युकी सांचौर में ना तो कोई भोगोलिक व्यवस्था लोगो के आजीविका के लिए उपयुक्त थी और ना मानवीय विकास उद्योग जिस से की वो कमा कर अपना जीवन चला पाए। 

पिछले दशक में इतना बदलाव हो गया कि अब देसावारी कमाई से जायदा असामाजिक रूप से कमाई ने लोगो को आकर्षित किया ओर इसमें युवा इस क़दर आकर्षित हुआ की एक बड़ी संख्या में हर जाती, समाज में ऐसे युवाओं की होड़ लग गई। एक काली गाड़ी, सफेद कपड़े ओर रोब जमाने वाले गोगल्स। शादी, सामाजिक कार्यक्रम में प्रतिस्पर्धा में अंधाधुंध फिजूल खर्ची का दौर चला। सांचौर में पहले सिर्फ खेती की कमाई ही जरिया था और 70 प्रतिशत वो भी बारिश पर खेती निर्भर थी क्युकी कुछ भाग में ही मीठा पानी था। इसके बाद लोग सांचौर से बाहर निकल कर स्वाभिमान से संघर्ष कर डेसावरी में मेहनत कर अपने आप को योग्य बनाया ओर समाज में भी योगदान दिया पर सांचौर में नेहर आने के बाद व्यवस्था बदल गई और लोगो के जीवन में सुखद पहल आने लगे पर उसके साथ साथ लोगो में आपसी वैमनस्य बढ़ने लगा, एक दूसरे को पैसों के बल नीचा दिखाने की होड़ लगी ओर इसके नतीजन नकारात्मक घटनाओं में वृद्धि हुई। सांचौर शहर में अब तीन तरह की आर्थिक व्यवस्था का बोलबाला है। खेती की इनकम, डेसवारी इनकम और एक अन्य इनकम जिसे आप सब जानते है। पिछले पांच वर्षो में सांचौर न्यूज हेडलाइन बन गया है और कुछ ना कुछ वजह रही है । इस से युवा शक्ति गलत तरीकों के प्रति रुझान बढ़ा है और इसको हम सब मिलकर रोकना चाहिए।

सांचौर में अंधी कमाई को समाज ने भी सम्मान दिया और हर समाज का व्यक्ति इन कमाई के आगे नतमस्तक सा खड़ा है। फिर हर असामाजिक गतिविधि को गर्व माना जाने लगा ओर सामाजिक बदलाव भी उसी का भाग था।

आज सांचौर में भाईचारा, मान सम्मान और अपनास की जगह जातीय रोबदारी, ठसक और वर्च्चव ने ले ली है। 

मेरी बात को आगे बढ़ाते हुए खिव सिंह जी लिखते है कि....

युवाओं की ऊर्जा उचित, उपयुक्त, सकारात्मक और सही दिशा में प्रवृत्त होंनी चाहिए। अनुचित एवं गलत प्रवृतियों का महिमामंडन नही होना चाहिए। मेहनत और संघर्ष से हासिल उपलब्धियों का ही सम्मान व बखान किया जाए। गलत तरीके से वर्चस्व स्थापित करने की होड़, अनुचित एवं अवैध तरीकों से अकूत धन संपत्ति कमाने की कुत्चित प्रवृति एवं आपतिजनक गतिविधियों को सामाजिक स्तर पर हिकारत भरे नजरिए से देखा जाकर हतोत्साहित किया जाना चाहिए। बहरहाल सामाजिक सद्भाव, आपसी भाईचारा, सर्वजातीय सम्मान, स्वस्थ व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का स्थापन एवं आदर्श जीवन मूल्यों के साथ सामाजिक मर्यादाओं का पालन करते हुए सकारात्मक ऊर्जा एवं सोच के साथ विकास की सही दिशा में अग्रचर हुआ जाए तो निश्चित रूप से सत्यपुर का गौरव बढ़ेगा और पुराना वैभव लोटेगा। नया जिला बनना सार्थक होगा। और इसकी ख्याति बढ़ेगी! #सांचौर #में_संचौरी #sanchore

शुक्रवार, 4 अगस्त 2023

बाजरा की खेती। बाजरा खाने का फायदा। Millet Agro। India

#मुठ्ठी #भर #बाजरे #के #लिए #में #हिंदुस्तान #की #सलतनत #खो #बैठता

ये वाक्य उस वक़्त दिल्ली के बादशाह शेरशाह सुरी के मुंह से निकले थे जब वो भीषण युद्ध से हार कर निकला था,
जी हां ये बाजरा जिसने हमारी कहीं पीढ़ियों को संभाल कर रखा दैनिक जीवन उपयोगी भोजन में काम आने वाला बाजरा दरअसल भारत और अफ्रीका में पाया जाता है इसकी उत्पति करीब 2000 ईसा पूर्व की बताए गई है.

बाजरा एक ऐसी फसल है जिसके लिए ज्यादा अच्छी भूमि ओर पानी की जरूरत नहीं होती है इसके लिए मानसून का समय उपयोगी होता है और वैसे इसे पानी देकर भी पकाया जा सकता है.

बाजरा कम पानी ओर उच्च तापमान में ओर कम समय में,कम खर्चे में फसल पक जाती है,ये राजस्थान में सबसे ज्यादा ओर विशेषकर जालोर,बाड़मेर,जैसलमेर ओर थोड़ी थोड़ी राजस्थान के हर भाग ओर गुजरात में होती है
ये फसल ही हमारे जीवन जीने का आधार था उसका उपयोग खाने और जरूरी काम के लिए उसको बेच कर जो पैसा आता था उस से काम चलता था.

बाजरा का खाने के साथ साथ पशु चारा ओर बीयर बनाने के काम आता है इसमें फाइबर ओर एनर्जी विटामिन होते है जो बहुत काम आते है ये महिलाओ में खून की कमी को पूरा करता है ओर भी इसके बहुत फायदे है.

आजकल हमारा क्षेत्र नेहरी होने के कारण बाजरा की बुवाई कम होने लगी है ओर लोगो के भोजन में बाजरे की जगह गेंहू ने ले ली है वर्ना एक वक़्त था ' फाफरे तो मेहमान आते तब बनते थे ' ,
नवी पिडी भी आजकल बाजरे का भोजन कम करने लगा है अक्सर पाचन शक्ति का बहाना बनाते है पर ये पाचन शक्ति बढ़ाने में मददगार है.
हमेशा बाजरी के साथ साथ घी, गावरफली की सब्जी,प्याज,दही, गुड़ हो तो आप जमकर इसका लुफ्त उठाते होंगे 
अब धीरे धीरे बाजरे की उपयोगिता बढ रही है लिहाजा इसके एक्सपोर्ट का ऑप्शन भी खुला है जो बन्धु एग्रो बिजनेस में है..

वंदन इस बाजरी को जिसने हमारी कहीं पीढ़ियों को संभाला 👍👍
 #बाजरी #फसल #फायदे #सांचौर #जालोर #राजस्थान #एग्रो #बिजनेस #बीयर #आयरन

शनिवार, 22 जुलाई 2023

राजेन्द्र गुढ़ा क्यू हुए बर्खास्त मंत्री पद से। राजस्थान

राजेन्द्र गुढ़ा आबो हवा को पहचान जाते है। उनको पता है की चुनाव नजदीक है न्यूज और चर्चा में कैसे बना रहा जाता है। वो अपनी राजनीति के पक्के खिलाड़ी है। बाकी इतनी हिम्मत कौन कर सकता है। पल भर में ड्रेंड कर रहे है। बीजेपी मित्र स्वागत में खड़े है। वैसे पासवान जी के नक्शे कदम पर है। 

झुंझनु के उदयपुरवाटी से दो बार बसपा और कांग्रेस से जीत चुके है। इनके भाई रणवीर गुड़ा 2003 में लोक जन शक्ति टिकट पर जीते थे। जो राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्र संघ अध्यक्ष रह चुके है।

शिवम् गुड़ा राजेन्द्र गुड़ा के पुत्र है जो सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय है और जन सेवा में है।
 

#राजेन्द्र_गुढ़ा #Rajasthan #rajasthanelection2023

चुनावी भोज सांचौर। 🤗 #बात_करामात

चुनावी भोज सांचौर।  🤗 #बात_करामात 

दाल, सिरा, सोगरा ....

चुनाव आते ही चुनावी भोज की चर्चा खूब होती है और इसमें जमकर भाई लोग अपने शरीर का वजन ओर खून खूब बढ़ाने में लग जाते है पर इसका भी अपना एक इतिहास  है। आइए हम अपने विधानसभा सांचौर की बात करे और पता करे की सांचौर में ये चुनावी भोज कब शरू हुआ था।

तो थोड़ा बहुत पीछे जाना होगा और ये वो समय था जब लगातार सांचौर में विधायक पद पर विराजमान श्री रूगनाथ जी विश्नोई के राजनीतिक जीवन का निचला स्तर चल रहा था ओर करीब 1985 के बाद ओर 1990 के शरुआत में जब लक्ष्मी चंद जी मेहता दूसरी बार विधायक ओर पहली बार बीजेपी से विधायक बने । तब तक सामान्य खर्चे में चुनाव हो जाता था।

इधर सांचौर कांग्रेस किसी नए चेहरे की तलाश में थी जो युवा हो ओर कुछ नयापन लगे समाज में लिहाजा तब सांचौर से देसावरी की इनकम आना दिखने लगी थी ओर उनकी नजर श्री हीरालाल जी विश्नोई पर आकर टिकी जो युवा ओर खर्चे करने में योग्य थे। 

1990 के जल्द के बाद 1993 में चुनाव आ गए और अब सांचौर की राजनीति में देसवारी इनकम का बोलबाला शरु हो गया था लिहाजा सांचौर कांग्रेस से हीरालाल जी ने चुनावी भोज की मानो शरुआत की हो और तब से रोज सांचौर विश्नोई धर्मशाला में कड़ाई चढ़ने का रिवाज शरू हो गया। हर दिन लापसी, सिरा और दाल बनने लगी ओर इस भोज ने सांचौर की राजनीति को खर्चीला करने में अहम भूमिका निभाई । 
जब एक तरफ सिरा ओर रोज घी के पिपे खाली होने लगे तो फिर लक्ष्मीचंद जी ने भी अपनी राजनीति बचाने के लिए खर्चा बढ़ाया पर वो दाल और सोगरे (बाजरी) रोटी तक ही सीमित रहे ।

पर हकीकत में चुनावी भोज की महकी खुशबू की शरुआत करीब 1998 माने तो बेहतर होगा ये काल वो था जब सांचौर से दो युवा नेता और दोनों देसावरि ताकत का अहसास कराने वाले थे और आप को याद होगा लंबी हाइट ओर देशी अंदाज में कलबी समाज से श्री जीवाराम चौधरी चुनावी मैदान में उतरे और तब हीरा - जीवा जैसे नारे खूब चले और श्री जीवाराम के चुनावी मैदान में उतरते ही मेटल के दो सीधे व्यपारि की भिडंत हुई जिसमें देसवरि खर्च दिखने लगा और सांचौर के मतदाता भी इस बहाने चुनावी सभा का खूब हिस्सा बनने लगे और तब जीवाराम जी ने भी कल्बी ( आंजना) समाज की धर्मशाला में जहां दाल सौगरे बनते थे अब वहा भी बनास डेरी से घी के पीपे उतरने लगे ओर बड़ी बड़ी कड़ाई में दाल, सोग रेे के साथ साथ सिरा इधर भी बनने लगा ओर सांचौर की जनता खूब महकती खुशबू का भरपूर भोजन का आंदन लेने लगी जो आज तक निरंतर चालू है । 

मेरे भाई लोगो के चुनाव आने से चेहरों पर रंगत आ जाती है। कही बार तो अंगुलिया ओर होटो पर घी की चिकनाई ही नजर आती है।

आज सांचौर की राजनीति में श्री हीरालाल जी से शरू हुई ये  भोज परम्परा का कारवां श्री जीवाराम, श्री मोती बा, श्री सुखराम जी ओर श्री दानाराम राम जी तक पहुंच गया है। वैसे आजकल गृह प्रेवश भी चुनावी दस्तक की आहट माना जाय।

चुनाव भी सांचौर का कुछ ज्यादा ही खर्चीला माना जाने लगा अगर राजस्थान के अन्य हिस्सों की तुलना करे तो आजकल मामूली सरपंच, पार्षद, डेलीगेट में भी कड़ाई चढ़ने लगती है ओर बड़ी पंचायत में सरपंच चुनाव 40-50 लाख तक पहुंच गया है। 

इस चुनावी मोहत्सव में कुछ भाई तो सुबह उधर दिखते है ओर शाम को इधर दिखते है इन वोटो का कोई भरोसा नहीं कब किसी के लिए बटन दब जाएं। 

अब साहब इतना दाल, सिरा जीम लेंगे तो हम किस आधार पर अपने नेता से सही काम की मांग कर सकते है। .....वैसे आजकल घी भी मिलावटी आ रहा है थोड़ा दोस्तो अपनी सेहत का ध्यान रखे ये होटों पर चिकनाई ना आए तो चलेगा।🤗 

सिर्फ बातो को पंक्तिबद्ध किया है। वैसे जुड़ते रहिए आगे भी सांचौर राजनीति का सफर जारी रखेंगे। सिर्फ मजाक रूपी ले 🙏

#सांचौर #sanchore #पॉलिटिक्स

रविवार, 22 जनवरी 2023

कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता है। मेहनत ही पैसा है। work culture। work choice।

कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता उसको मेहनत से किया जाय तो उसमे ही अच्छी कमाई होती है।

हर भारतीय या फिर दुनिया के कोई भी देश का लड़का या लड़की और उनके माता पिता यही चाहते है की में या फिर मेरा पुत्र या पुत्री किसी अच्छी जगह पर नौकरी करे ।

इसी चलन के कारण  धीरे धीरे ऐसे कार्यों की हर जगह मांग बढ़ रही है जो कोई नहीं करना चाहता है जैसे कड़ियां काम, क्लर काम, इलेक्ट्रीशियन काम , या फिर ऐसे काम जिनकी जरूरत के हिसाब से डिमांड बढ़ती है। अमेरिका जैसे देशों में व्हाइट कॉलर जॉब की वजह से अन्य कामो के लिए अन्य देशों के लोगों को वर्क परमिट दिया जाता है और अच्छी खासी इनकम भी होती है।

पर हर कोई यही चाहता है कि उनके लिए एक बेहतरीन वातानुकूलित ऑफिस हो, कुर्ची हो ओर अच्छा खासा सोफे वाला ऑफिस हो जहां पर बैठ कर अपने आप को मन में लगे की में एक अच्छी खासी नौकरी कर रहा हूं या कर रही हूं।

वर्षो से हमारे यहां फिर दुनिया में अलग अलग कार्य क्षेत्र के लिए अलग अलग कोलर के नाम से कार्य की पहचान होती है।
सबसे पहले व्हाइट कॉलर जॉब हर किसी की चाहत होती है और आज भी उसका चलन ओर समाज में उसकी एक अलग पहचान है। व्हाइट कॉलर जॉब मतलब हमारे समाज में एक अधिकारी जैसा मान ओर सम्मान होता है जिसमें व्यक्ति के पास एक पद होता है जो समाज में समान पाने का जरिया होता है। व्हाइट कॉलर जॉब जितना दिखने में अच्छा उतना ही जिम्मेदारी और दबाव वाला जॉब होता है।

व्हाइट कॉलर के साथ साथ दुनिया में ओर भी जॉब होते है जैसे ब्लैक कॉलर जॉब मतलब ऑयल,रिफाईनरी या रबड़ उद्योग जैसे कार्य करने वालो के लिए ब्लैक कोलर जॉब माना गया है । उसी तरह रिटायरमेंट के बाद जॉब करने वाले जॉब को ग्रे कॉलर जॉब माना जाता है।

जो लोग गोदाम, वेयर हाउस, मैन्युफैक्चरर जैसे उद्योग में काम करने वालों जॉब को ब्लू कॉलर जॉब माना जाता है। जो लोग प्रकृति, पर्यावरण प्रेमी और उन से जुड़े जॉब करते है उनको ग्रीन कॉलर जॉब माना जाता है।

कोविड़ काल के बाद एक नया जॉब चलन में आया जो लोग घर पर बैठ कर काम करते है जिनके लिए ऑफिस की कोई ड्रेस नहीं होती है। वो घर पर बैठे बैठे काम करते है लिहाजा उनके पहनने के लिए कपड़े का कोई नियम नहीं होता लिहाजा इनके लिए नया नाम ओपन कॉलर वाला जॉब माना जाता है।

होटल,ऑफिस में रिचिपनिस्ट और पुस्तकालय जैसे जगह पर काम करने वालों को पिंक कॉलर जॉब माना जाता है।
इसके अलावा भी ऐसे जॉब जो दुनिया के अन्य देशों में कानूनन मान्य है पर हमारे देश में ना मान्य है ओर ना होने चाहिए ऐसे जॉब वालो को स्कारलेट जॉब करने वाला माना जाता है।
और भी देशों में और भी कॉलर जॉब होंगे। 

कार्य केसा भी हो हर काम बडा होता है बस उसको मन से किया जाए तो उसमें भी अच्छी खासी इनकम कर सकते है बदले की में दूसरों की चॉइस वाला काम करे।





गुरुवार, 19 जनवरी 2023

युवा क्यू अटल ब्रिज बहुत जाते है। अहमदाबाद।Atal bridge I River Front Ahmedabad

ये एक ऐसा ब्रिज है जहां पर छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा यू ट्यूब र और इंस्टग्रमाम पर रिल बनाने वाला जाना चाहेगा। 
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इस ब्रिज पर सुबह से शाम ओर विशेषकर संध्या काल में पर्यटकों और युवा वर्ग की भीड़ सी लगी रहती है। और शानदार फोटो ग्राफ के साथ साथ लोग रिल बनाते नजर आएंगे।

ब्रिज का उदघाटन देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किया तब से लोगो के लिए अहमदाबाद में देखने के लिए ये अटल ब्रिज खास जगह बन गया है।

इसकी डिजाइन बहुत ही आकर्षक है दूर से देखने पर एक मशली आकर का दिखता है ओर साथ ही साथ इसमें पतंग उत्सव को भी ध्यान में रखते हुए इसके कलर में विभिन्न तरह की प्तंगो के कलर आप को देखने को मिल जाएगा।

ये अच्छे खासे धातु से बनाया गया है इस पर सिर्फ पैदल चलने के लिए है, मोटरसाइकिल या कार नहीं ले जा सकते हो। उसके लिए पार्किंग की व्यवस्था है।

अटल ब्रिज में आप चाय कॉफी का भी आनंद ले सकते है इसके लिए कैफे की सुविधा के साथ साथ नाश्ता की स्टाल भी मिल जाएगी।

अटल ब्रिज रिवर फ्रंट पर बना हुआ है जो दो किनारों को मिलता है। रिवर फ्रंट शाम ओर सुबह में घूमने की अच्छी जगह है। 

अटल ब्रिज के पास में फूलों का गार्डन ओर साथ ही साथ आप नौका विहार का भी आनंद ले सकते है। 

अटल ब्रिज से अहमदाबाद की खूबसूरती में चार चांद लग गए है। 

आप भी जब कभी अहमदाबाद जाए तो जरूर अटल ब्रिज घूम आए।  बस 30 रुपया टिकट देके।

बुधवार, 18 जनवरी 2023

जिंदगी एक सफ़र है। साथ चलता है अपनों का प्यार।

आज मातृत्व दिवस हैं और मेरी तरफ से मां के चरणों मे कोटी कोटी वन्दन,

 'सालवे ने जाजे दिकरा' ,जीव रा जतन करजै.
यह शब्द पढ कर आप को भी याद आ गया होगा की यह शब्द हर मां अपने लाडले को देशावर रोजगार पाने के लिए जब मा का लाडला घर से विदा लेता है तो मां अपने लाडले को कहती हैं,  
 हमे मारवाड़ से रोजगार पाने के लिए अपने राज्य से दुसरे राज्य मे जाना पड़ता है तब आवाजाही के लिए बस या ट्रेन का सहारा लिया जाता है और इस तरह की तस्वीर आप ने भी अपने जीवन मे बहूत बार देखी होगी और इस तरह का अनुभव लिया होगा. रोजगार के लिए जब पहली दफा आप घर से निकलते है तो कठिनाई की पहली परीक्षा यह बस या ट्रैन ही करवा देते हैं सिमित साधन की वजह से आप को इस ठुसमठुस वाली स्थिति मे बैठना पड़ता है और इस अनुभव को मेने भी महसुस किया है पर आपके जीवन की पहली कठिनाई को आप जैसे तैसे करके अपने सपनो के शहर मे उतर जाते हैं और फिर गांव की दुनिया से आप शहर की भीड़ भाड़ वाली, स्वार्थपन और दौलतमंन्द वाली जगह पर आ जाते हैं, आप के विचार और मन भी सपनो के शहर मे हिलोरे मारने लगते हैं फिर अाप उस जिन्दगी मे रम जाते हैं कही वर्षो अपने सेठ के साथ हंसी, खुशी, सुख दुःख और कष्ट सह कर आप अपने अनुभव को मजबूत करते हैं और फिर एक दिन आप अपना व्यवसाय शुरू कर देते हैं. आप के जीवन का स्वरुप बदलता है और उसके साथ साथ आप कही लोगो के जीवन को बदलते है. इस तरह की समस्या से उपर उठकर आज राजस्थानी भाई दुनिया के हर कोने मे अपने हुनर और कौशल का डंका बजाते है और पुरी दुनिया उन्हे नमन करती है. 
अन्त मे बस इतना ही कहना चाहता हूं की तस्वीर को शेयर करने से किसी के दिल को ठेस पहूचें तो माफी का हकदार हूं.. 
पर अब वक्त बदला है थोड़ा हमे अपने जीवन के बारे मे भी सतर्क रहना चाहिए बेवजह इस तरह की यात्रा ना करे... और मा के शब्द जीव रा जतन करजै को सही उपयोग करें... इस तरह के दृश्य साचौंर से मम्बुई वाली बसो मे आम हैं.. 

श्रवण चौहान

कैसी झूठी शान। समाज

कैसी झूठी शान... 

तेज और आधुनिकता से भरी जिन्दगी मे कौन किसका होता है, जो मिला जब मिला तब हाय हैलो बोल दिया और चल दिया. जनसंख्या बढी, प्रतिस्पर्धा बढी और रोजगार के संसाधन कम हुए. हम उस कौम से आते हैं जहां एक कमाने वाला और बाकी सब खर्च या खाने वाले मिलेगें ऐसी स्थिति मे आज के समय परिवार कैसे चले. हम झूठी शाने शौकत मे लाखों उड़ा देते हैं, लाखो मयखाने की दीवारों और नजराना मे फेंक देते हैं क्युकी यह थोपित झूठी शान हैं हमारी, हम लाखों का बन्धेज लंहगा बना लेगें क्युकी हमारा पेरवाश हैं.. उफ यह खर्चे और नकरे तो बढे समय पर नकद नही बढी. समय के बदलते मापदडों को हमने अपने विरूद्ध समझा ना हम उसके साथ चले ना हम उसके साथ चलना चाहते हैं हमें आज भी जो मांगने से मिल रही है उसे लड़कर लेने मे शान समझते हैं.. कैसे हम जिद्दी और खडुस हैं. 
समाज की शान और ताकत त्याग और तप हैं और वो होना चाहिए पर बदलते वक्त मे जिस रिवाज को छोड़ना है उसे क्यु गले की गांठ बनाकर चल रहे हैं. 

हर कोई लाखों नही कमाता,बड़ा मुश्किल से परिवार चलता है उस पर भी अगर भगवान नाराज हो जाये तो परिवार क्या खाने के लाले पड़ जाते हैं तब शरूआत होती हैं जिवन जीने की जंग. हम हाथ फैलाते हैं अपनो से, हम अरदास करते हैं चाहने वालों से पर जब भगवान ही रूठा तो कौन है इन्सानी ताकत जो हमारा सहारा बनेगा. 
ऐसी विकट स्थिति  मे महिला को बाहर निकलना पड़ता है जीवन और सन्तान को बचाने के लिए. समाज लांछन लगायेगा. समाज बाते करेगा. समाज क्या क्या नही करेगा वो आप भी जानते हैं और वो सब. 

अफसोस उसे तो जीना है. त्याग का रास्ता कब तक उसे रोकोगे.. क्युकी उसे उसके बच्चे की चित्कार उसे बैठने नही देगी. जब सब जगह से निराशा हाथ लगे तो वो रोजगार के लिए कार्य करेगी वो खराब तो नही होगा पर समाज के मापदंडो मे नीचा होगा. 

धत.. हम रोज संगठन और समाज की बात करते हैं, इतिहास, भुगोल और भविष्य की बात करते हैं.. धत ऐसे संगठनो के जो एक शब्द मे पुरे समाज की ताकत बोलते हैं पर उन्की हकीकत मे पहूंच चंद जिलों मे है.. क्या छोटे भाग पर महिला रोजगार के लिए काम नही हो सकता..ऐसे संगठन क्यु नही बनता जो रोजगार देने की बात करें.. लड़ने और मारने के सिवाय भी रास्ते हैं..

 आज मे दुःखित हूं अजमेर की घटना से ना में सिर्फ बल्कि आम राजपूत को ठेस पहूंची होगी पर क्या करें आखों मे पानी और रोष के सिवाय कल फिर भुल जायेगें... 
यह घटना चेतावनी जागो और आगे बढो.. उन लोगो का कोटी कोटी धन्यवाद जो उस बहिन तक मदद पहुंचाई है.. काश थोड़ा पहले हो जाता तो उन लोगों के तंज नही सुनना पड़ता उस  बहिन को.... उफ दुःखित, चिन्तित
 (किसी की भावनाओं आहत हो तो माफ करना ) 
श्रवण चौहान

भिड़ में खोया इंसान लौट आया है। human life

#भीड़ #मे #खोया #इंसान #लौट #आया #है 

जब से जन्म लिया और समझ आयी तब से यही सिखाया गया, पढाया गया, बोला गया, सुनाया गया, दिखाया गया की ये 21 वी सदी है आगे बढो, दौड़ते रहो, नही तो दुनिया मे पिछे रह जाहोगे. 

इस दौड़ मे हर कोई शामिल हो गया, देश दुनिया का आम इंसान इस रेस का राही बन गया, जो लोग गावों मे रहते थे वो भी आगे बढने की रेस मे शहरो की तरफ भागने लगे गांव खाली से हो गये थे.. 

दौड़ मे यही था की कैसे भी करके आगे बढो येन केन पैसा कमाए उसी पैसो के बल पर तुम्हारी सफलता नापी जायेगी. 

दौड़ इतनी अन्धी हो गयी थी की इसमे सच्चा इंसान इस भीड़ मे खो गया था, हर जगह सफलता के पैमाने सुनाये जाने लगे, आम इसांन ना चाहकर भी इस भीड़ का हिस्सा बन गया था कौन किधर जा रहा था तो कौन किधर आ रहा था, उसका कोई पता नही लग रहा था, हर कोई अपनो से पराया हो रहा था, हर कोई बड़े परिवार से छोटे परिवार मे विश्वास करने लगा था, हर कोई अपने को आगे रखना चाहता था, चाहे सामने वाला मरे या जीये वो अपनी जीत सुनिचित करना चाहता था. 

दौड़ मे परिवार बिछड़े, परिवार मे भाई बिछड़े, बहन,नाना नानी, मामा मामी,काका काकी, बान्धव, कुटुम्ब  सब का संबन्ध एक साकेंतिक मात्र रह गया था बस इंसान को तो सफल होना था. 

भीड़ इतनी थी की मानव जात की क्रद  नही थी ना सुनने वाले, ना दिखने वाले रोज किस्से रोज अखबार और टिवी सक्रिन की सुर्खिया थी, मानवता तार तार थी लोग किसी को बचाने नही अपने आप को आगे बढा रहे थे.. 

भीड़ भौतिक सुख सुविधा के लिए मरे जा रही थी मां बाप के रिस्ते और व्यवहार को भुला रही थी रोज कान खड़े करने वाली खबरे पढी जा रही थी लोग पैसो के लिए क्या क्या नही कर रहे थे.. 

भीड़ ने मान लिया था की अब अगर पिछे रहे तो इस भीड़ मे कुसले जायेगें बस दौड़ो दौड़ो, भागो भागो, 

हर कोई बिजी था, किसी के पास दो वक्त के लिए समय नही था ना परिवार के लिए और ना ही आस पड़ोस मित्र सगे रिस्तेदारो के लिए, बस पैसा ही सब कुछ था... 

कॉर्पोरेट हाउस तो ऐसे जिदां ताबुत थे की बस तुमको तो यह करना पड़ेगा नही तो यह हो जायेगा, तुम पिछे रह जाहोगे, वो हो जायेगा. इसांन को इतना डरा दिया था की इंसान इस भीड़ का सजीव होते हुए निर्जिव प्राणी बन गया था. 

निर्जीव प्राणी बन दर दर की ठोकरे खाने को मजबुर था ना जिने की चाह थी और ना मरने का भय उसे तो उस भीड़ मे काबिल बनना था.. 

लोग कहते थे दुनिया तेज हो गयी अब चंद मिन्ट के लिए नही रूकेगें, दुनिया इतनी विकसित हो गयी है की इंसान को जिदां कर देती है दुनिया एक मिन्ट मे सामने वाले को खत्म कर देती हैं, एक मिन्ट मे सामने वाला कहां छुपा है पता कर देती है, दुनिया आकाश से पाताल और पाताल से गगन तक जा पहूंची हैं की पुछो मत अगर तुम नही दौड़े तो क्या होगा कैसे जिदां रहोगे... 

इस झूठी कल्पना और अधीं दौड़ को एक मामुली वायरस ने रोक दिया विश्व के सब देश खौफजादा है जो शक्तिशाली होने का दंभ भरते थे जो अणु परमाणु रोबोट की बात करते थे वो भगवान के भरोसे बैठे हैं, देश के हर जगह भय व्याप्त है कोई उस से बच नही पा रहा है, कोई इस छोटे से वायरस से सिना तान कर सामने नही आ रहा हैं. 

जो बड़े बड़े शहर पैर रखने की जगह नही थी वो विरान से पड़े हैं लोग घरो की तरफ भाग रहे हैं इस से बचने के लिए महाशक्तियो से नही सिर्फ भगवान के भरोसे है वो चिकित्सा भी लाचार है जो भगवान मे विश्वास कम करती थी वो विकसित का दभं भरती थी. 

हवाई बंद, ट्रेन बंद, बस बंद, गाड़ी बंद, मोल बंद, पब बंद, बड़े बड़े होटले बदं, दुकाने बदं, कारखाने बदं, आलीशान बगलेॉ बदं, बड़ी बड़ी गाड़ीया बदं, शानो शौकत के रास्ते बदं, अमीर का दभं भरने वाले बदं कमरो मे बदं, हर तरफ बदं.

वो भीड़ धिरे धिरे कम हो गयी वो काबिल होने की दौड़ खत्म हो गयी. 

उसी भीड़ मे खोया सच्चा व्यवहार, अपनापन और सरलता का राही इंसान फिर घर की और लौट आया है, वो सुकुन की सांस लेकर बोल रहा है यह सब अधीं दौड़ मिथ्या थी ना संसकृतिं का मान था ना इसांन का.. 

आज भीड़ से लौटा इसांन परिवार के साथ हर पल बिता रहा है, पुराने समय को याद कल रहा है और भुले भगवान को याद कर रहा है और भगवान से अरदास करते हुए कहता है हम तो भोले प्राणी है तुही शक्तिमान तुही सर्वदाता है अब तुमको ही हमे बचाना है... 

भीड़ से लौटा इसांन एकबार फिर आकाश को निहार रहा है और नींद के आगोश मे सो गया... ना टी टी की आवाज, ना प्रदूषण... 

भगवान से इंसान यही कह रहा है अबकी बार बचा ले फिर कभी इसांनियत को मरने नही दुगां...... 

भगवान सबको कुशल मंगल रखे, हम भारतीय जितेगें और दुनिया को रास्ता दिखायेगें की तेज रफ्तार से ज्यादा इसांनियत है...... 

भीड़ मे खौया इसांन लौट आया है.. 

श्रवण चौहान

समस्या को बोझ ना बनने दे। motivational

#समस्या #को #बोझ #ना #बनने #दे। 


एक प्रोफेसर कक्षा में दाखिल हुए। उनके हाथ में पानी से भरा एक गिलास था। 

उन्होंने उसे बच्चों को दिखाते हुए पूछा, “यह क्या है?” छात्रों ने उत्तर दिया, “गिलास।” प्रोफेसर ने दोबारा पूछा, “इसका वजन कितना होगा ?” उत्तर मिला, “लगभग 100-150 ग्राम।” उन्होंने फिर पूछा, “अगर मैं इसे थोड़ी देर ऐसे ही पकड़े रहूं तो क्या होगा ?” छात्रों ने जवाब दिया, “कुछ नहीं।” “अगर मैं इसे एक घण्टे पकड़े रहूं तो ?” प्रोफेसर ने दोबारा प्रश्न किया। छात्रों ने उत्तर दिया, “आपके हाथ में दर्द होने लगेगा।” 
उन्होंने फिर प्रश्न किया, “अगर मैं इसे सारा दिन पकड़े रहूं तो क्या होगा” ? तब छात्रों ने कहा, “आपकी नसों में तनाव हो जाएगा। नसें संवेदनशून्य हो सकती हैं। जिससे आपको लकवा हो सकता है।” प्रोफेसर ने कहा, “बिल्कुल ठीक। अब यह बताओ क्या इस दौरान इस गिलास के वजन में कोई फर्क आएगा ?” जवाब था कि नहीं। तब प्रोफेसर बोले, “यही नियम हमारे जीवन पर भी लागू होता है। यदि हम किसी समस्या को थोड़े समय के लिए अपने दिमाग में रखते हैं। तो कोई फर्क नहीं पड़ता। 

लेकिन अगर हम देर तक उसके बारे में सोचेंगे तो वह हमारे दैनिक जीवन पर असर डालने लगेगी। हमारा काम और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होने लगेगा। इसलिए सुखी जीवन के लिए आवश्यक है कि समस्याओं का बोझ अपने सिर पर हमेशा नहीं लादे रखना चाहिए। समस्याएं सोचने से नहीं हल होतीं। सोने से पहले सारे समस्यायुक्त विचारों को बाहर रख देना चाहिए। इससे आपको अच्छी नींद आएगी और आप सुबह तरोताजा रहेंगें।

शिक्षा:-

समस्याओं को लेकर अधिक परेशान नहीं होना चाहिए। इससे हमारा नुकसान ही होता है 

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चाहत नहीं इरादे होने चाहिए..Motivational

चाहत नहीं इरादे होने चाहिए.. #YSR
#Yogendra #SINGH #Rathore 

आज मुझे एक हम उम्र, युवा शख्स से मिलने का मौका मिला जिसने कम समय मे बहूत कुछ अपने नाम कर लिया और यही क्रम अनवरत चल रहा है और चलता रहेगा ऐसी मनोकामना करता हु.
में बात कर रहा हूँ अजमेर के समीप एक साधारण राजपुत  परिवार मे जन्मे  #Yogendra #SINGH #Rathore जो आज एक बेहतरीन renowned #NATIONAL LEVEL #Mind and #Memory #trainer, #inspirational and #motivational #public #speaker, life coach and a rising #entrepreneur as well.  He is the #author of the book -'#Awaken the great potential of Memory and #Will-power'. उन्के बारे मे जीतना लिखे उतना कम पड़ेगा उन्होने 2010 में Nirma University से B.Tech किया RPET मे 42 वा रेंक मिला, कही नेशनल और इन्टरनेशल पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं, उन्होने अपनी बात मे बताया की वो एक साधारण परिवार से आते हैं और परिवार मे सभी और आस पास के सब नौकरीयात मतलब सर्विस क्लास मे विश्वास करने वाले लोग थे,  मेने भी इन्जीनियरिंग की और मुझे अच्छी नौकरी मिल गयी  पर मेरे मन मेे कुछ लिक से हटकर कुछ ऐसा करना चाहता था जिसमे मुझे पैसा और प्रसिद्धी दोनो मिले, मेने लाईफ चेंजर, मोटीवेशन स्पीकर बनने की ठानी पर जब यह बात घर वालो को बताई तो पुरा परिवार, रिशतेदार मुझे अलग अलग ढंग से समझाने लगे, जिन्दगी का नफा नुकसान बताने लगे और ऐसा ना करने के लिए कही उदाहरण तक दीये गये पर मेरे मन मे बस जो सोचा वो करने का ठान रखा था अन्त मे मेने यही रास्ता चुना, शरूआत मे बड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, कही दफा फाईनेन्सियली और कही दफा प्रोफेशनली पर उन्होने कभी हार नही मानी और लड़ते रहे और आगे बढते गये.आज बताते हुए खुशी है की वो नेशनल लेवल की सेलीब्रिटिज बन गये हैं और कम्पनी के ब्रांड ऐम्बेडर भी है और तो और आज उनकी कम्पनी 10 करोड़ नेट वर्थ की कम्पनी बन गयी हैं. भारत मे सबसे ज्यादा योगी के रूप में  instagram पर follow करने वाला कारनामा आप के नाम हैं. 
बोलने की कला जबरदस्त हैं उन्की बातो मे अध्यात्मिकता का भी कन्सेपट झलकता है. घोड़े जैसा जोश है पुरा सेशन जोशिला और लाईफ कोन्सप्ट के साथ रहता है.

ऐसे युवा से मिलकर अच्छा लगा और भविष्य मे तरक्की करे ऐसी उम्मीद करते हैं, और उन्के बतायी बात की चाहत नही इरादे होने चाहिए उसे जीवन मे उतारने की कोशिश करेगें. बहूत खुब धन्यवाद 
#YSR #AHMEDABAD #MOTIVATIONAL #SESSION

प्रवासी आफत नही अवसर..! कोरोणा काल

#प्रवासी #आफत #नही #अवसर... Covid time

हम सब के जीवन काल मे ऐसा पहली बार ही हुआ है की अपने घरो से आजीविका कमाने निकले हमारे अपने लोग घर वापस आने के लिए जी तोड़ मेहनत और येन केन रूप से एकबार घर पहूंचना चाहते हैं. 


सरकार की परीक्षा 

राजस्थान की स्थापना के बाद शायद ही ऐसी कोई सरकार रही होगी जिन्हे इस रूप मे ऐसी वस्तु स्थितियों का सामना करना पड़ रहा होगा, राजस्थान मे करीब हर जिले, गांव कस्बो से लोग रोजगार के लिए देश विदेश जाते हैं और वही रहकर अपने घरो और राज्य को पैसे भेज कर मजबूत करते हैं. वो एक तरफ से सरकारो के लिए कतई बोझ नही बने और जब जब सरकार ने इन प्रवासियों को आर्थिक सहयोग के लिए याद किया है तो दिल खोलकर अपने गांव, जिले और राज्य की तरक्की के लिए सहयोग किया है. 

जालोर-सिरोही एक नजर में.. 

राज्सथान के यह दोनो जिले ऐसे है जिन्में से पशास प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा मे लोग प्रवासी हैं. इन दोनो जिलो की सम्मानता भी है और वो यह की दोनो एक लोकसभा के भाग है और जिसका नतिजा यह है की वर्षो से यह लोकसभा एक पिछड़ा हुआ लोकसभा माना जाता है, सासंद बुटा सिंह से लेकर वर्तमान सासंद जी तक इस लोकसभा के विकास के नाम पर जय माताजी ही मिली है इन जिले को आज भी पिछड़े हुए जिले की श्रेणी मे रखा जाता है उसके पिछे बेसिक सुविधा का ना होना और यह नही होने का कारण हमारी लीडरशिप की योग्यता मे कमी मानना उचित होगा. 

जैसा की अब प्रवासी करीब करीब जिलो मे लौट चुके हैं और जिले पर दबाव बढता रहा है उसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं, 
कल तक ग्रीन जोन मे गिने जाने वाला जिला अब ओरेन्ज के बाद रेड जोन की तरफ बढने लगा है और इधर हम अपने लोकसभा जिलो के चिकित्सा सुविधा का आकलन करे तो सुविधा 'मोणा मे मुठी' बराबर है मतलब की शुन्य है, ना बड़े अस्पताल है ना बड़े डॉक्टर है ना बड़ी जगह जहां पर बेड की व्यवस्था हो सके, कोरोना मे वेटंिलेटर की आवश्यकता मानी जाती है तो लोकसभा मे कुल मिलाकर 20 मशीन नही होगी, लोकसभा मे वर्तमान सासंद जी जो तीसरा अपना कार्यकाल मे है अब तक कितने बड़े अस्पताल लोकसभा मे लाये यह तो उन्के लोग ही बता सकते हैं. 

जालोर सिरोही मे अधिक मात्रा मे लौटे प्रवासी बन्धु जो दो तरह के है उन्मे एक सेठ है और दुसरे श्रमिक बन्धु. इस विपरीत हालातो मे सेठ बन्धु को अपना घर बार चला लेगें पर जो श्रमिक बन्धु है उन्का क्या वो महिने का कमाई घर भेजते थे आज वो भी बन्द है अब इस समस्या का सामना यहा की वतृमान राज्य सरकार को करना पड़ेगा इन बन्धुओ के रोजी रोटी की व्यवस्था करने का जिम्मा अब राज्य सरकार पर है शायद यह पहली बार राज्य सरकार पर बोझ बन रहे वर्ना हमेशा स्वाभिमानी से कमा कर पैसा राज्य मे भेजा है पर अब हालात विपरीत हैं कोरोना की वजह से सब कुछ छोड़ जीव बचाने के घर को लौटे हैं. 

समस्या मे समाधान... 

जालोर सिरोही समेत राज्य के अधिंकाश जिले मे प्रवासी बन्धु लौटे हैं और कोरोना के डर के साथ साथ बेरोजगारी का डर भी अब लगने लगा है. 
अगर यह लोकडाउन की समय सीमा बढती हैं तो बेरोजगारी का आंकड़ा भी अचानक बढ जायेगा, क्युकी एक बेरोजगारी की संख्या वो है जो यहा स्थाई है और दुसरा प्रवासी बन्धुओ का मिलन इस संख्या मे इजाफा कर सकता है. 
सरकार इस समस्या से निपटना चाहे तो बेहतर ढगं से प्लानिंग करे तो जो प्रवासी बन्धु बाहरी राज्य मे रहकर व्यापार कौशल, मेहनत, लगन से कमाई करते हैं उसी को इस राज्य मे परखा जाये मतलब की सरकार ऐसे अवसर पैदा करे की प्रवासी बन्धु अपने जिले, राज्य मे ही रहकर रोजगार पाये और पैदा करे जो बाहरी राज्य मे निवेश है उन्हे अपने इधर मोड़े. 
सरकार को इसके लिए व्यापक स्तर पर कार्य योजना की जरूरत पड़ेगी ना की मनरेगा जैसे कार्य चला कर.

 सरकारी इच्छा शक्ति दिखा कर जो कही वर्षो से हमारे राज्य मे औधोगिक ऐरिये है जैसे 'रिको जोन' ऐसे जगह मे नयी जान डालनी पड़ेगी लाईट, पानी और बेसिक सुविधा का विस्तार करना पड़ेगा, टैक्स मे छुट और यातायात की सुविधा करनी पड़ेगी, ईजी बिजनेस का मोडल तैयार करना पड़ेगा को इतनी बड़ी संख्या मे यह मेन पावर का सही इस्तेमाल हो सकता है.

 जैसा की कहा गया है की बड़ी महामारी या घटना के बाद पुरे विश्व मे बहूत कुछ बदल जाता है तो हो सकता है हमारा राज्य इस आफत को अवसर समझ कर कार्य करे तो राजस्थान एक नये युग मे प्रवेश करेगा. 

आफत नही अवसर.. 

कोरोना काल मे सब कुछ रूका सा पड़ा है हर कोई इस कठिन समय के गुजर जाने की प्रतीक्षा मे बैठा है की सब कुछ सही रहते हुए यह काल अपने उपर से बिना किसी को निगले निकल जाये जिससे की परिवार बचा रहे. 

जैसे ही सब बुरा वक्त गुजरे तो हम सब जालोर-सिरोही वासियो के लिए कुछ वक्त बैठ कर सोचने की वक्त है.

 हमारे जिले करीब सतर साल बाद भी पिछड़े हुए क्यु?  हमारे लोकसभा मे आज भी बड़ा कोई अस्पताल क्यु नही? हमारा जिला बिजनेस लोगो के लिए जाना जाता है तो यह सुविधा लोकल स्तर पर क्यु नही ?  हमारे जिले के लोग जब नेता प्रवास पर जाते हैं तो फुल मालाओं से लाद देते हैं पर बुरे वक्त मे सब सब कहा छुप गये?? क्या इन नेताओ को सामूहिक प्रयास नही करने चाहिए थे..?  क्या अब भी हम चुनाव वक्त जातियों मे बंट जायेगें...? क्या एक आम युवा प्रवासियों के लिए आवाज उठाता रहा हो यह  काम इन चुने हुए नेता का नही था...?  हजारो रूपये खर्च कर क्यु आना पड़ा???  पास के लिए दर दर क्यु भागना पड़ा??? 

इन सब सवालों के मन मे दबा रखिये और वक्त आने पर जवाब जरूर मांगना.... 

हमारी लीडरशिप इस समस्या को आफत ना समझकर अवसर माने और इस दिशा मे अभी से पहल करे तो बहूत कुछ बदल सकता है. 

आप सभी प्रवासी बन्धुओ और हम सब मिलकर सरकारी आदेश का पालन करे और कोरोना से बचे... 

जय जलन्धरनाथ जी जय सारणेश्वर जी
#जालोर-#सिरोही

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

जय उमिया माताजी। ऊंझा गुजरात। umiya mataji unjha ।

कहते हैं.. कडवा पाटीदार समाज की कुलदेवी मां उमिया को  भगवान शिव ने स्वंय उुजां गुजरात मे विराजमान किया था,  विक्रम संवत 212 में वहां के राजा व्रजपालसिंह ने मदिर का निर्माण करवाया और फिर राजा अवनिपत ने बड़ा सा हवन करवाया था जिसमे करीब सवा लाख नारियल और घी का उपयोग किया गया था.

उसके बाद विक्रम संवत 1122-24 में वेगडा गामी ने वापिस निर्माण करवाया क्युकी उसे अलाउध्दिन खिलजी के सेनापति उूलग खाना ने तोड़ दिया था. 1943 मे पाटीदार समाज ने मंदिर का सम्पूर्ण निर्माण करवाया और उसमे हर पाटीदार घर से हिस्सा लिया गया और उसमे आगेवान श्री रामचन्द्र मनसुख लाल,गायकवाड़ गर्वमेन्ट और पाटड़ी दरबार थे. 1952 से यह ट्रस्ट से संचालित होता हैं, जेठ सुद 2 को यहा उत्सव आयोजित होता है जिसे `हेल खेलना ना हलोतरा' 'भटवारी' नाम से जाने जाते हैं, मा उमिया की अशिम कृपा पाटीदार समाज पर बनी हुई हैं और आज वे धन धान्य से सम्पूर्ण जीवन जीते है, वैसे उूंजा आज कृषि उत्पादो का पुरे देश का केन्द्र माना जाता है और पुरे देश भर से यहा व्यापरी खरीद बेच के लिए आते हैं यहा पर जीरा, सौंफ, राई, तिल जैसे उत्पादो का जोर रहता है. जी हा उूजा मंडी मे आप को गुजरात और राजस्थान के लोग ज्यादा मिलेगें वहा पर अधिकतर दुकाने पाटीदार समाज के लोगो की है और उन्के साथ मे राजस्थान के बाड़मेर, गुड़ामालानी, चोहटन, साचौंर के लोग भी मिल जायेंगे. मा उमिया सब पर अपनी  कृपा बनाये रखे और किसान और व्यापारीयो के चेहरे पर चमक बरकरार रखे. 

#जय #उमिया #माताजी. #Unjha #Umiya #mataji

सोमवार, 16 जनवरी 2023

जब धर्म की हानी हुई तब तब क्षत्रिय ने जीवन बलिदान दिया है। #जय #सोमनाथ ।#हमीर #जी #गोहिल।

#जब #धर्म #की #हानी #हुई #तब #तब #क्षत्रिय #ने #जीवन #बलिदान #दिया #है। #जय #सोमनाथ ।#हमीर #जी #गोहिल।


सौराष्ट्र जिसे सोरठ और काठियावाड़ भी कहते हैं, खंभात और कच्छ की खाई के बीच की भूमि, जहाँ कई वीर क्षत्रियों ने जन्म लिया, कई संतो ने अपने ज्ञान से इस भूमि को पवित्र किया, जहाँ के चारण आज भी बहुत गर्व से सोरठ भूमि की गाथा कहते हैं.

सोरठ भूमि का गोहिलवाड, अमरेली जिले के लाठी में भीमजी गोहिल के यहाँ हमीर जी गोहिल का जन्म हुआ . बचपन से ही बहादुर हमीर जी, एक बार खाना खा रहे थे तब इन्हें इनकी भाभी द्वारा ये पता चला की विदेशी आक्रमण कारी सोमनाथ मंदिर लूटने आ रहे हैं. इनकी भाभी ने ताना मारते हुए कहा, आज सोरठ की भूमि पे कोई भी ऐसा क्षत्रिये खून नही बचा, जो विदेशी आक्रमणकारियों  का सामना करके उनसे सोमनाथ मंदिर की रक्षा कर सके. हमीर गोहिल का क्षत्रिय खून खौल उठा, उनसे ये ताना वर्दास्त नही हुआ, और खाने से उठकर, उन्होंने प्रतिज्ञा ली की जीते जी सोमनाथ किसी विदेशी को लूटने नही दूँगा. भाभी को अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने उसे रोकने की कोशिश भी की पर वो नही रुके, और अपने साथ दुसरे २०० वीर लोगों को लेकर सोमनाथ की तरफ चल पड़े.

रास्ते में एक जगह विश्राम करते समय इनके कान में मरशिया (वीरों के मरने पर गाये जाने वाले गीत) गीत सुनाई दिया, हमीरजी ने देखा एक बूढी माँ गीत गा रही हैं, उन्होंने पास जाकर पूछा आप किसका मर शिया गा रही हो बा, बूढी माँ बोली अपने बेटे का, अभी १५ दिन पहले ही उसका स्वर्गवास हुआ है. हमीर जी ने कहा बा आप अपने पुत्र का मरशिया गा रहे हो उसी तरह मेरा मरशिया गाओगे, मुझे मरने से पहले अपना मरशिया सुनना है.

बा बोली बेटा, ये क्या कह रहे हो ? एक जवान जिन्दा मर्द का  मरशिया गाकर मुझे पाप का भागीदार नही बनना. हमीर जी ने कहा , मैं घर से प्रतिज्ञा लेकर निकला हूँ की जीते जी सोमनाथ विदेशियों को लूटने नही दूंगा, वहां सुल्तान ज़फर की फ़ौज है और यहाँ हम सिर्फ २०० लोग, मरना तो निश्चित है, तो आप बिना किसी संकोच के मरशिया गाओ बा. बा ने कहा सोमनाथ की रक्षा के लिए निकले हो, मैं वहीँ जा रही हूँ, तुझ से पहले पहुचुंगी वहां जाकर देखूंगी की तू किस वीरता से लड़ता है, उस तरह से ही तेरे मरशिया गाऊँगी, और बा सोमनाथ के लिए निकल गयीं.

आगे गिर के जंगल से गुज़रते  समय हमीर जी गोहिल का सामना जंगल में रहने वाले भीलों से हुआ, भीलों को जब ये मालूम हुआ कि ये नौजवान दल सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए इस ओर आया है, तो उन्होंने उनका बड़ा स्वागत किया. भील सरदार वेगडा जी भी अपने ३०० भील बंधुयों के साथ इस दल में शामिल हो गए और उन्होंने भी सोमनाथ की रक्षा की कसम ली. भील सरदार वेगडा जी की बेटी से हमीर जी का विवाह हुआ, और उस दिन वहां बहुत खुशी मनाई गयी.

अगले दिन सब अपने हथियारों सहित सोमनाथ मंदिर, प्रभास तीर्थ की और बढ़ चले. वहां पहुंचकर प्रभास का बाहरी क्षेत्र वेगडा जी ने संभाला और मंदिर का क्षेत्र हमीर जी ने अपने हाथों में लिया.

ज़फर खान की सेना जब प्रभास पहुंची तो उनका सामना पहले वेगडा जी भील से हुआ, वेगडा जी भील और उनके भील सिपाहियों ने जमकर टक्कर ली और तीर कमान से तोपों का सामना किया, पर जफ़र खान ने तोपों के गोले उन पर बरसाना चालू रखा, अंत में सभी भील सिपाही सोमनाथ की रक्षा करते हुए शहीद हुए.

ज़फर खान की सेना भीलों से सामना होने के बाद आगे बढ़ी, यहाँ हमीर जी गोहिल से सामना हुआ, जफ़र खान की सेना बराबर तोपों से गोले बरसाती रही फिर भी हमीर जी गोहिल ने ९ दिनों तक डटकर सामना किया. अंत में हमीर जी ने केशरिया करने का निर्णय किया, और सबको युद्ध रचना समझा दी, सब वीरों ने केशरिया साफा सर पे बांधा और किले के दरवाजे खोल कर सब मैदान में आ गए. सब ने वीरों की तरह मैदान में रण कौशल दिखाया, और जब तक लड़ सकने की एक भी उम्मीद उनके आखरी खून की बूंद में रही वे लड़े, अंत में सिर्फ हमीर जी बचे. ज़फर खान ने अपनी सेना को हमीर जी को चारों और से घेरने का हुक्म दिया, सारी सेना अब हमीर जी को घेर कर उनपर वार करने लगी, और लड़ते लड़ते उस वीर ने भी वहीँ, सोमनाथ की शरण में प्राण त्याग दिए.

उसके बाद ज़फर खान सोमनाथ मंदिर को लूटकर, फिर से उसे ध्वस्त करके अपनी राजधानी लौट गया.

જનની જણતો ભગત જણજે, કા આવા શુરવીર અને કા દાતાર, નહિતર રહેજે વાંજણી, મત ગુમાવીશ તારૂ નુર.

#श्रवण #चौहान #Somnath #temple #Shrawan #Chauhan

मारवाड़ का नाश्ता,भोजन। राजस्थान

#घाट, #घें या #राबडी 

जब सूरज देवता अपनी अधिकतम ताकत का अहसास करवा रहे हो और जेठ महिना अपने भारतीय संस्कृति मे जेठ सा सर ढक कर रहने का अहसास करवाये उस समय  इन से बचने के लिए इन्सान कही जतन करता है. 

अभी राजस्थान मे गर्मी जमकर अग्नि बरसा रही है और पंखा, कुलर और वातानुकूलित यंत्र भी इस तेज धुप के सामने हांफते नजर आ रहे हैं. 

वैसे गर्मिया के दिन है तो अंधिकाश बच्चे घर आये हुए है तो कुछ विवाह सिजन या कोई काम से देश आये हुए हैं और वो लोग जो शहरी जीवन के आदी हो गये हैं उन्को अभी गर्मी से बचने के लिए कई जतन करने पड़ रहे हैं. 
वैसे में भी गर्म हवा और तेज का ताप नापने के लिए गांव हूं. 

गर्मी मे व्यक्ति ना तो ज्यादा खा सकता है ना ज्यादा घुम फिर सकता है. 

यह जो तस्वीर है यह राजस्थान और अंधिकाश मारवाड़ मे आज भी घरो मे देखने को मिल जायेगा. जी हां बात कर रहा हूँ मारवाड़ की परंपरागत और सातवीक, सादा और पाचक भोजन 'घाट' या 'घें' और तरलता का रूप हो तो उसे राबड़ी कह सकते हैं. 
 दरअसल मारवाड़ मे बाजरे प्रमुख खाघान्त अनाज माना गया है और यही एक फसल होती है जो हर घर की भोज्य जरूरत को पुरा करती है. बाजरी से बनने वाला सोगरा और साग जग सावे है... और यह ताकतवर भोजन माना गया है सोगरा शरीर की सभी जरूरतो को पुरा करता है. 

बात कर रहे थे घाट  की तो घाट बाजरी से ही बनती है. बाजरी को अधकसरा कर दिया जाता है और उसे किसी ओखली या हमाम मे कुटा जाता है. फिर किसी मिट्टी के बर्तन मे इसे छाछ के साथ चुल्हे पर पकाया जाता है.. पकने तक इसमें लकड़ी का डोयला घुमाया जाता रहता है जिससे उसमे गलेट ना पड़े.. पकने के बाद इसको रख दिया जाता है. 
सुबह इसको आप छाछ, दही या दुध के साथ आराम से खा सकते हैं इसे नाशते के वक्त, भोजन या बेफारा के टाईम या शाम के वक्त दुध के साथ बड़े आराम से जीम सकते हैं. 
यह ठण्डा तासीर का भोज्य है इसके जीमने से आप के पेट मे ठंडक का अहसास होगा, पाचन शक्ति भी बढाता है. और तरलता रूप होने के कारण आप गर्मी मे जीमने से पेट का भारीपन अहसास नही करेगें. 

घाट आजकल कही घरो मे नही के बराबर बनती है इसे एक पुराना और अनपढ लोगो का भोजन माना गया और नये लोगो कही बार मजाक भी करते हैं. घाट को गरीबी से भी जोड़ा गया.. वैसे इसको बनाने की मेहनत ही कम बनाने की वजह हो गयी है.. देसावरी लोग होने के कारण घर घर मे गाय भैंस पालना बन्द कर दिया है उसकी मार आज गावों मे साफ दिखती है.. 

छाछ शहर मे आज आसानी से मिल जायेगी पर अब यह गावों मे मिलना दूभर हो गया है.. बिन छाछ घाट की कल्पना मुश्किल है. 
वैसे आधुनिकता मे अगर कोई इसे तड़का या टेस्ट दे तो यह शहर मे सुबह के वक्त लेने वाला पौष्टिक आहार माना जाने लगेगा.. जैसा ईडली डोसा... 
मैं तो लुफ्त ले रहा हूँ आप भी मारवाड़ पधारे तो एक बार घर पर घाट बनवाई और आनन्द से जीमिये.. 

यह हमे जमीन से जुड़े रहने का आहसास करवाता है और तलीय भोजन से बेहतर है.

वक्त बदला है वक्त की निशानियां नही.. जल ही जीवन है।

#वक्त #बदला #है #वक्त #की #निशानियां #नही.. 

आज जब पुरी दुनिया जल संरक्षण के विषय पर बड़े बड़े सेमिनार आयोजित कर रही हैं. वही हमारे भारत मे प्रथम वक्त जल मंत्रालय का निर्माण कर पुरे भारत मे देश के प्रधानमंत्री जी इस मिशन और मुहिम मे जुटे है और इस मंत्रालय का जिम्मा हमारे लाडले मारवाड़ के सांसद गजेन्द्रसिंह जी के हाथ है और प्रधानमंत्री जी को उम्मीद भी है की राजस्थान के लोग जल संरक्षण विषय को बेहतर समझते हैं जिसका लाभ पुरे भारत को मिले. 

वैसे आज यह विषय ज्वलंत लग रहा है इसका पुर्वानुमान हमारे पुर्वजो को पहले भी था और वो इस जल सुखा से लड़ते आये है और लड़ रहे हैं आने वाली पिढियो के लिए. 

करीब लोकतंत्र के शरूआती वक्त मे हमारे बावरला ठां. उदेयराजसिंह जो उस वक्त करीब और आज के वक्त सात आठ पंचायतो के प्रमुख थे जो हाल मे बावरला, किलवा, डभाल, हाडेचा, जानवी, दातिया, सरवाना और आमली तक शामिल थी. 

उन्के दूरगामी सोच का अनुमान इस बात से लगाया जाता है की जब उन्होने गांव वासियों के लिए एक सिमेन्ट का कुआं, साथ मे हौद बनाया था.यह जल स्रोत बड़ा ही आधुनिक बना हुआ था उस वक्त के हिसाब से.
कुएं से पानी निकल कर पहले हौद मे गिरता था फिर एक नाला से दुसरे हौद मे जाता था जिसका पनिहारी पानि भरती थी, दुसरा पशुओं के लिए पर उससे पहले स्नान के लिए भी काम आता था.. नजदीक से देखने पर उस कुआं और हौद के निर्माण कला का दाद देने का जी करता है. 

आज के वक्त मे यह हौद जरूर दिखता है पर कुआं पुर्णत जमीन मे दबा गया है, बरसात के पानी का स्टोरेज करने के लिए तालाब कच्चा बनाया हुआ था जो अब जमीन के बराबर दिखता है. 

आज केन्द्र सरकारे और राज्य सरकारे करोड़ो रूपये खर्च कर रही हैं वही सरकारे अगर पहले वक्त मे बने और अब बंद पड़े जल स्रोतो, नलकूप, तालाब का पुर्ननिर्माण करवाये तो जल संरक्षण मिशन मे सफलता के कदम मे एक और कदम साथ हो जाये... 

राजपूत कभी कमजोर नहीं हुआ।

#कौन #राजपूत #कमजोर हुआ.?


एक वक्त ऐसा आया जब कही लेखको ने राजपूत समाज को नकारात्मक की मुर्ति बना दिया और उसमे पतन और एकता की कमी जैसे शब्द हर लेख, कहानी या भाषणो और आपसी बातचीत मे जिक्र होने लगा और वही  बाते पढाते  और सुनाते गये उन्होने माना और उसे आगे बढाया गया नेताओ और समाजिक प्रबुद्ध लोगो के उद्बोधन मे इन बातो की झलक सुनाई देती रही है..

 पिछली तीन चार दशको की जेनरेशन ने यही पढा और नकारात्मक का बोध किया.. वो मानने लगे की हा हमारे मे एकता नही है... 

क्या सचमूच मे ऐसा था या है...हा परिस्थितियों के बदलाव मे समाज को उस धारा मे जीवन जीने के हालात मे सामजस्य बिठाणे मे समय लगा और वो कही जगह जहां उन्का प्रतिनिधित्व होना था नही हो पाया या भाग नही ले पाये जिससे एक बड़ा गेप आ गया और उसको विरोधी लेखको ने एकता की कमी और पतन से समाज को लुहलाहन करते रहे और कर रहे हैं... 

नकरात्मक का दुसरा भाग सकारात्मक भी होता है कभी उस विचार से अपने आप को पढे अपने पुर्वजो को पढे तो यह इस दुनिया के लेखको का कालाजादु आपके सामने आ जायेगा.. 
लोकतंत्र व्यवस्था मे समाज के रह व्यक्ति ने हर भाग मे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई हैं हर कोने मे अपने आप को पाया है.. आप दस मिन्ट आखें बन्द करके सोचे जिस भाग मे जानना चाहगें वहा आपके समाज का प्रतिनिधित्व करता हुआ कोई ना कोई राहगीर मिलेगा.. 

ऐसे लोग और मेरे मित्र जब यह कहते हैं की एकता की कमी है तो उन्हे यही कहूंगा भाई अब बस करो हम मे एकता की कमी नही कही ना कही सामंजस्य का अभाव था.. 
एक बार सकारात्मक सोचो समाज के प्रति आप अपने आप को दुनिया का खुश व्यक्ति मानगें.... 
सब समाज का सम्मान करे वो भी सम्मान करेगें...

हमारे सामाजिक ठेकेदार भी कमी है, कमी है का ढोल पिट कर उल्लु सिधा करते रहते हैं... बस उन्से उम्मीद की वो कुछ पोजिटीव सोचे.. जय माताजी

डूब रहा था भारतीय जंगी बेड़ा फिर भी नहीं छोड़ी शिप, बेखौफ सिगरेट के कश लगाते रहे कैप्टन ।कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला और आईएनएस खुकरी।

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जिम्मेदारी जीवन से बड़ी होती है और उससे बड़ा देश, यही भावना उस वक्त भारत के महान सपूत, भारतीय नौसेना के अधिकारी और आईएनएस खुकरी के कप्तान महेंद्र नाथ मुल्ला की रही होगी जब उन्होंने जान बचाने का मौका छोड़कर डूबते हुए अपने जहाज के साथ समंदर में जल समाधि ले ली थी

कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला और आईएनएस खुकरी। 

जिम्मेदारी जीवन से बड़ी होती है और उससे बड़ा देश, यही भावना उस वक्त भारत के महान सपूत, भारतीय नौसेना के अधिकारी और आईएनएस खुकरी के कप्तान महेंद्र नाथ मुल्ला की रही होगी जब उन्होंने जान बचाने का मौका छोड़कर डूबते हुए अपने जहाज के साथ समंदर में जल समाधि ले ली थी। उनका वह फैसला आज भी शोध का विषय बना हुआ है और यह मान लिया जाता है कि कप्तान ने नौसेना परंपरा को निभाते हुए ऐसा कदम उठाया। 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी थी। जंग में भारत पाकिस्तान पर भारी था। भारतीय नौसेना के दो जंगी जहाज आईएनएस खुकरी और आईएनएस कृपाण को पाकिस्तानी पनडुब्बी हैंगर को नेस्तनाबूत करने की जिम्मेदारी दी गई थी। दोनों जंगी जहाजों के कमांडिंग कप्तान महेंद्र नाथ मुल्ला थे। अरब सागर में दीव के करीब भारतीय युद्धपोत हैंगर को निशाना बनाने के लिए बढ़ रहे थे। खुकरी और कृपाण दोनों ही ब्रिटिश कालीन जहाज थे जिनके मुकाबले पाकिस्तान की फ्रेंच पनडुब्बी हैंगर आधुनिक थी।

9 दिसंबर 1971 को हैंगर ने कृपाण पर टारपीडो फायर किया लेकिन वह निशाने न लगकर कृपाण के हल पर लगा जिससे वह डूबा तो नहीं लेकिन समंदर में वहीं ठहर गया। हैंगर ने खुकरी को निशाना बनाया और भारतीय युद्धपोत के ईंधन टैंक पर दो टारपीडो से धमाका कर दिया। देखते ही देखते मौत का मंजर नजर आने लगा। तेल फैलने पर समंदर में भी आग लगी थी, जहाज में तेजी पानी भर रहा था। कप्तान मुल्ला को पता था कि जहाज डूब जाएगा, उन्होंने जहाज को खाली करने का आदेश दिया और अपनी लाइफ जैकेट भी एक जूनियर को थमा दी। उस त्रासदी में बचने वाले लोगों में से एक रिटायर्ड कमांडर एसएन सिंह ने टीओआई को उस भयानक मंजर की दास्तान सुनाई। सिंह ने बताया कि रात के 8:45 बज रहे थे, आकाशवाणी समाचार के प्रसारण के ठीक बाद पीएनएस हैंगर के दो टारपीडो ने जहाज पर हमला किया। मुल्ला को अहसास हुआ कि जहाज को नहीं बचाया जा सकता है तो उन्होंने उसे खाली करने का आदेश दिय


उस प्राण हरने वाली रात में 6 अधिकारी और 61 नौसैनिक ही जान बचा पाए थे। 18 अधिकारियों और 178 जवानों ने जल समाधि ली थी जिनमें कैप्टन मुल्ला भी थे। उस भयानक मंजर से निकलने वालों के लिए सबसे मार्मिक पल वह था जब उन्होंने देखा कि जहाज के पुल पर एक कुर्सी पर 45 वर्षीय कैप्टन मुल्ला बैठे थे, जहाज डूब रहा था और वह सिगरेट के कश मार रहे थे। नौसेना की परंपरा को सर्वश्रेष्ठ रूप से गले लगाते हुए मुल्ला ने खुद को बचाना मुनासिब नहीं समझा। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से ताल्लुक रखने वाले कैप्टन मुल्ला को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था और उनकी वीरता की कहानी हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई जो कयामत तक नौसैनिकों में जिम्मेदारी की प्रेरणा भरती रहेगी। #Jay #Hind #INS #Khukri #Diu #travelphotography #indianphoto #indianarmy #salute #diu #diutour

मूंगफली की फसल और फायदे।

मूंगफली की फसल और फायदे।  मूँगफली peanut, या groundnut, वानस्पतिक नाम : Arachis hypogaea. https://youtube.com/shorts/PCXDt5vbxd0...