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शनिवार, 22 जुलाई 2023

चुनावी भोज सांचौर। 🤗 #बात_करामात

चुनावी भोज सांचौर।  🤗 #बात_करामात 

दाल, सिरा, सोगरा ....

चुनाव आते ही चुनावी भोज की चर्चा खूब होती है और इसमें जमकर भाई लोग अपने शरीर का वजन ओर खून खूब बढ़ाने में लग जाते है पर इसका भी अपना एक इतिहास  है। आइए हम अपने विधानसभा सांचौर की बात करे और पता करे की सांचौर में ये चुनावी भोज कब शरू हुआ था।

तो थोड़ा बहुत पीछे जाना होगा और ये वो समय था जब लगातार सांचौर में विधायक पद पर विराजमान श्री रूगनाथ जी विश्नोई के राजनीतिक जीवन का निचला स्तर चल रहा था ओर करीब 1985 के बाद ओर 1990 के शरुआत में जब लक्ष्मी चंद जी मेहता दूसरी बार विधायक ओर पहली बार बीजेपी से विधायक बने । तब तक सामान्य खर्चे में चुनाव हो जाता था।

इधर सांचौर कांग्रेस किसी नए चेहरे की तलाश में थी जो युवा हो ओर कुछ नयापन लगे समाज में लिहाजा तब सांचौर से देसावरी की इनकम आना दिखने लगी थी ओर उनकी नजर श्री हीरालाल जी विश्नोई पर आकर टिकी जो युवा ओर खर्चे करने में योग्य थे। 

1990 के जल्द के बाद 1993 में चुनाव आ गए और अब सांचौर की राजनीति में देसवारी इनकम का बोलबाला शरु हो गया था लिहाजा सांचौर कांग्रेस से हीरालाल जी ने चुनावी भोज की मानो शरुआत की हो और तब से रोज सांचौर विश्नोई धर्मशाला में कड़ाई चढ़ने का रिवाज शरू हो गया। हर दिन लापसी, सिरा और दाल बनने लगी ओर इस भोज ने सांचौर की राजनीति को खर्चीला करने में अहम भूमिका निभाई । 
जब एक तरफ सिरा ओर रोज घी के पिपे खाली होने लगे तो फिर लक्ष्मीचंद जी ने भी अपनी राजनीति बचाने के लिए खर्चा बढ़ाया पर वो दाल और सोगरे (बाजरी) रोटी तक ही सीमित रहे ।

पर हकीकत में चुनावी भोज की महकी खुशबू की शरुआत करीब 1998 माने तो बेहतर होगा ये काल वो था जब सांचौर से दो युवा नेता और दोनों देसावरि ताकत का अहसास कराने वाले थे और आप को याद होगा लंबी हाइट ओर देशी अंदाज में कलबी समाज से श्री जीवाराम चौधरी चुनावी मैदान में उतरे और तब हीरा - जीवा जैसे नारे खूब चले और श्री जीवाराम के चुनावी मैदान में उतरते ही मेटल के दो सीधे व्यपारि की भिडंत हुई जिसमें देसवरि खर्च दिखने लगा और सांचौर के मतदाता भी इस बहाने चुनावी सभा का खूब हिस्सा बनने लगे और तब जीवाराम जी ने भी कल्बी ( आंजना) समाज की धर्मशाला में जहां दाल सौगरे बनते थे अब वहा भी बनास डेरी से घी के पीपे उतरने लगे ओर बड़ी बड़ी कड़ाई में दाल, सोग रेे के साथ साथ सिरा इधर भी बनने लगा ओर सांचौर की जनता खूब महकती खुशबू का भरपूर भोजन का आंदन लेने लगी जो आज तक निरंतर चालू है । 

मेरे भाई लोगो के चुनाव आने से चेहरों पर रंगत आ जाती है। कही बार तो अंगुलिया ओर होटो पर घी की चिकनाई ही नजर आती है।

आज सांचौर की राजनीति में श्री हीरालाल जी से शरू हुई ये  भोज परम्परा का कारवां श्री जीवाराम, श्री मोती बा, श्री सुखराम जी ओर श्री दानाराम राम जी तक पहुंच गया है। वैसे आजकल गृह प्रेवश भी चुनावी दस्तक की आहट माना जाय।

चुनाव भी सांचौर का कुछ ज्यादा ही खर्चीला माना जाने लगा अगर राजस्थान के अन्य हिस्सों की तुलना करे तो आजकल मामूली सरपंच, पार्षद, डेलीगेट में भी कड़ाई चढ़ने लगती है ओर बड़ी पंचायत में सरपंच चुनाव 40-50 लाख तक पहुंच गया है। 

इस चुनावी मोहत्सव में कुछ भाई तो सुबह उधर दिखते है ओर शाम को इधर दिखते है इन वोटो का कोई भरोसा नहीं कब किसी के लिए बटन दब जाएं। 

अब साहब इतना दाल, सिरा जीम लेंगे तो हम किस आधार पर अपने नेता से सही काम की मांग कर सकते है। .....वैसे आजकल घी भी मिलावटी आ रहा है थोड़ा दोस्तो अपनी सेहत का ध्यान रखे ये होटों पर चिकनाई ना आए तो चलेगा।🤗 

सिर्फ बातो को पंक्तिबद्ध किया है। वैसे जुड़ते रहिए आगे भी सांचौर राजनीति का सफर जारी रखेंगे। सिर्फ मजाक रूपी ले 🙏

#सांचौर #sanchore #पॉलिटिक्स

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