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सोमवार, 16 जनवरी 2023

वक्त बदला है वक्त की निशानियां नही.. जल ही जीवन है।

#वक्त #बदला #है #वक्त #की #निशानियां #नही.. 

आज जब पुरी दुनिया जल संरक्षण के विषय पर बड़े बड़े सेमिनार आयोजित कर रही हैं. वही हमारे भारत मे प्रथम वक्त जल मंत्रालय का निर्माण कर पुरे भारत मे देश के प्रधानमंत्री जी इस मिशन और मुहिम मे जुटे है और इस मंत्रालय का जिम्मा हमारे लाडले मारवाड़ के सांसद गजेन्द्रसिंह जी के हाथ है और प्रधानमंत्री जी को उम्मीद भी है की राजस्थान के लोग जल संरक्षण विषय को बेहतर समझते हैं जिसका लाभ पुरे भारत को मिले. 

वैसे आज यह विषय ज्वलंत लग रहा है इसका पुर्वानुमान हमारे पुर्वजो को पहले भी था और वो इस जल सुखा से लड़ते आये है और लड़ रहे हैं आने वाली पिढियो के लिए. 

करीब लोकतंत्र के शरूआती वक्त मे हमारे बावरला ठां. उदेयराजसिंह जो उस वक्त करीब और आज के वक्त सात आठ पंचायतो के प्रमुख थे जो हाल मे बावरला, किलवा, डभाल, हाडेचा, जानवी, दातिया, सरवाना और आमली तक शामिल थी. 

उन्के दूरगामी सोच का अनुमान इस बात से लगाया जाता है की जब उन्होने गांव वासियों के लिए एक सिमेन्ट का कुआं, साथ मे हौद बनाया था.यह जल स्रोत बड़ा ही आधुनिक बना हुआ था उस वक्त के हिसाब से.
कुएं से पानी निकल कर पहले हौद मे गिरता था फिर एक नाला से दुसरे हौद मे जाता था जिसका पनिहारी पानि भरती थी, दुसरा पशुओं के लिए पर उससे पहले स्नान के लिए भी काम आता था.. नजदीक से देखने पर उस कुआं और हौद के निर्माण कला का दाद देने का जी करता है. 

आज के वक्त मे यह हौद जरूर दिखता है पर कुआं पुर्णत जमीन मे दबा गया है, बरसात के पानी का स्टोरेज करने के लिए तालाब कच्चा बनाया हुआ था जो अब जमीन के बराबर दिखता है. 

आज केन्द्र सरकारे और राज्य सरकारे करोड़ो रूपये खर्च कर रही हैं वही सरकारे अगर पहले वक्त मे बने और अब बंद पड़े जल स्रोतो, नलकूप, तालाब का पुर्ननिर्माण करवाये तो जल संरक्षण मिशन मे सफलता के कदम मे एक और कदम साथ हो जाये... 

रविवार, 8 जनवरी 2023

#कभी #अपनी #वीरता #की #कहानी #कहने #वाला #आज #रो #रहा #है #अपनी #बदहाली #पर। #जालोर_किल

#कभी #अपनी #वीरता #की #कहानी #कहने #वाला #आज #रो #रहा #है #अपनी #बदहाली #पर। #जालोर_किला आज के राजपूतों ने सिर्फ बोतले फोड़ी है! जब से पढ़ना शुरू किया तब से जिला जालोर सीखा है वहीं एक और जालोर नाम से कहीं ना कही एक जुड़ाव सा लगता है और उसका कारण जिस समाज और जाती धर्म में जन्म लिया उसके पुरोधा का रिश्ता कही ना कही इस नाम से रहा है। करीब दिन के ग्यारह बज रहे थे और सुबह सिरे मंदिर दर्शन कर नीचे आने की थकान भी लग रही थी पर कही ना कहीं ऐसा लग रहा था कि अभी आज कि यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है ऐसा कुछ है जो अभी अधूरा है और उसके बिना ये यात्रा पूरी नहीं हो सकती । में जालोर शहर की सड़क पर खड़ा था पर में जैसे ही थोड़ा उपर देखने की कोशिश करता तो ऐसा लग रहा था कि कोई ना कोई मुझे बुला रहा है और तुझे आना ही होगा। आखिर कार दोस्तो ने कहा कि अगर वहा नहीं गए तो ये यात्रा अधूरी है। अब पक्का कर दिया था कि भले ही अभी 1000 सीढ़ियां उतर कर आए है पर अभी सिरे की तरह सिर मोहर के जैसे खड़े स्वर्णगिरी का वो अभेद किला, वो किला जो सदियों से आज भी खड़ा अपने वीरता कि कहानी बयां कर रहा है और हर किसी को अपने वीरता की कहानी बता रहा था। हम तिलक मार्केट से एक संकरी गली से यात्रा सरू की और एक बेहद संकरी गली से पूछते पूछते हम आगे बढ़ रहे थे और अफसोस हो रहा था कि जो मिलो दूर से अपनी सैकड़ों वर्षो से पहचान बता रहा हो उसके देखने आने वाले को जाने का रास्ता पूछना पड़े। थोड़ी दूर शहर की गलियों को पार करते ही फिर हमे पूछना पड़ा की क्या इधर से कोई किले का रास्ता जाता है तो दूर बैठी एक महिला ने अंगुली से इशारा किया और हम समझ गए की उधर जाना है। जैसे ही नजर उधर गई ओर पहली चिढ़ी पर पैर रखा तो अपने आप को मन धिकार रहा था कि हम केसे वसंज है जो अपने पूर्वजों की कभी सुध भी नहीं लेते है और ऐसे जिनका पूरा इतिहास वीरता, शौर्य और जन सेवा,रक्षा में जीवन त्याग करने में भरा पड़ा हो। हर एक सीढ़ी अपनी दुर्दशा बता रही थी। में भी अब अपने ऊपर से प्रशासन पर इस बदहाली का ठीकरा फोड़ रहा था। 

 बेहद खराब, उबड़ खाबड़ रास्ता और गंदगी से भरा रास्ता को पार करते हुए हम सबसे पहले "सूरज पोल" पहुंचे जो अब एक जर्जर हालत में थी और उसकी दीवारों पर आजकल के इशकजादो ने कोयलों से अपने नाम से दीवारें भर दी थी, ये वो पोल है जिस पर किले का प्रथम द्वार माना जाता है जिस पर सुरक्षा का पहला जिम्मा होता है ओर गर्व होता है पर आज अपनी बदहाली पर रो रही थी। पोल के उपर हिस्से में कभी दुश्मनों को छक्के छुड़ाने वाली तोप झाड़ियों में पड़ी थी और मन्न ही मन कह रही थी कि जिसका समय होता है उसकी कीमत होती है बाकी कोई पूछता तक नहीं। इस जर्जर, और गंदगी आलम के साथ हमको "ध्रुव पोल, चांद पोल" यही कहानी कह रही थी कि अब हमारी कोई सुध लेने वाला नहीं है । हम 1345 चीढ़ीया चड कर आखिर उस सबसे ऊंचाई वाले जगह पर आ गए जहां से हम सब वर्षो से इंतज़ार कर रहे थे और रोज गर्व भी करते है। "मामा लाजे भाटिया और कुल लजे चौहान" जैसे प्रसिद्ध वीर दोहे इसी जगह के है। करीब 11 वी सदी में कीर्ति पाल चौहान ने इस किले को अपने आधिपत्य में लिया और वीरता की कहानी गढ़ी गई। इन्हीं के पीढ़ी में काका कन्हदेव और "वीर वीरमदे सोनगरा" जैसे वीर हुए और उस वक़्त के निर्लज, क्रूर आक्रमणकारी खिलजी से लोहा लिया था और अपनी आन बान शान और राष्ट्र धर्म की रक्षा के लिए हजारों वीर योधो के साथ युद्ध कर अपने आप को त्याग दिया था पर कभी समझोता अपने पूर्वजों के नियम उसूल से नहीं किया। राई रा भाव राते बिता वो भी यही किला था। आज जब इतने वीरता भरे किले में प्रवेश किया तो अपने ओर अपने समाज ओर धर्म प्रेमी लोगो पर गुस्सा आ रहा था। गुस्सा इस सरकार के उस विभाग पर आ रहा था जो अपने नाम के हिसाब से ही कार्य करता है। किले में गंदगी, दीवारों पर नाम, पुरानी वस्तु को कबाड़ में फेंका गया।वहीं पड़ी सड़ रही है कोई सुध लेने वाला नहीं है। राजा मान सिंह और रानी का महल रो रहे थे अपने ऐसे हालात पर और उसकी पुष्टि कर रहा था उस के द्वार पर लगा पुरातत्व विभाग का बोर्ड जो इस हालत का साक्ष्य दे रहा था क्युकी उसका नाम भी साफ नहीं पढ़ पा रहे थे। किले के उपर महादेव मंदिर , चामुंड मंदिर, जैन मंदिर और भेरव जी के मंदिर मानो ये कह रहे थे कि अब अगर ज्यादा देर की तो कोई और यहां पर आ जाएगा और तुमरी पीढ़ियों को शायद हम भी ना दिखे। जहा कोना मिला वहा अतिक्रमण हो रहा है ।हर जगह मानो जैसे एक अभियान के तहत हो रहा हो। पर सब मौन है। 

शायद सब कुछ बित जाने पर जगेंगे जैसा हमेशा होता है। हम तो जीमेदर है साथ ही साथ ये पुरातत्व विभाग उतना ही खलनायक रोल में है जितना कि उस वक़्त में कोई आक्रमण करने वाला दुश्मन होगा, कोई किसी प्रकार का रख रखाव नहीं है। सब कबाड़ बन गए। कुछ जगह दीवारें गिरने की कगार पर है पर ये विभाग भी शायद उसका मानो इंतज़ार कर रहा हो। उसी और एक आशापुरा का मंदिर बन रहा है सोचा चलो कुछ अच्छा हो रहा पर जब जानकारी इकठ्ठा की तो एक बड़ा धक्का लगा कि उस मंदिर को कोई एक परिवार अपने श्रद्धा के हिसाब से बना रहा है। अरे हम तो जालोर सिरोही पाली अजमेर ओर पूरे भारत में कितने चौहान परिवार है क्या हम सब एक मा आशापुरा का मंदिर नहीं बना सकते पर अफसोस ना तो कोई किले आता है और ना किसी को पता हम तो अपने नाम के पीछे चौहान, गाड़ी के पीछे, कंकू पत्री या कहीं और सिंह लगाने में खुश है। हम वीरता के गाने गावरा कर अपनी झूठी शान में अपने आप को राजपूत हिन्दू मान कर अपने मन को खुश करते है। भेरूजी के भोपा जी ने भेरूजी के स्वभाव के हिसाब से बड़े कड़े ओर तीखे शब्दों में किले पर किस तरह किस किस ने अतिक्रमण किया उसका पूरा वृतांत सुनाया ओर अंत में इतना ही कहा कि में यहां वर्षो से हूं पर कोई राजपूत यहां नहीं दिखते है और जाते जाते इतना कहा कि राजपूतों ने तो बोतले फोड़ी है बाकी इतिहास को कोई देखभाल नहीं होता सब मौन ओर सोए हुए है। पर अंत में यह भी कहा कि आज का युवा पढ़ रहा है और ऐसे कार्यों के लिए जागरूक भी हो रहा है। अपने समाज को जगहों। अरे कभी अपने उस वीर योद्धा की तरह अडिग खड़ा उस किले पर जाकर तो आइए फिर मेरी तरह आप को अफसोस और झूठी शान करने में शर्मनदगी ओर दुख होगा। मेरी तो आप सब बंधुओ से एक ही प्राथना है आप जिस पर घमंड,गर्व करते है कभी तो उसकी सुध लो और पता करो हमे क्या करना था और क्या अब कर सकते है। माफ़ करना, ऐ विशाल किला तेरी इस दुर्दशा के कोई सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो हम और वो सब है जो वीरता, इतिहास का ढोल पीटने में कोई कमी नहीं रखते है और जो पास सबूत है उसकी हम कदर नहीं करते । आप को अगर कुछ भी सही लगा हो तो शेयर करे। एक बार जरूर पधारे.... #जालोर #किला #Jalore_fort
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मूंगफली की फसल और फायदे।

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