#कौन #राजपूत #कमजोर हुआ.?
एक वक्त ऐसा आया जब कही लेखको ने राजपूत समाज को नकारात्मक की मुर्ति बना दिया और उसमे पतन और एकता की कमी जैसे शब्द हर लेख, कहानी या भाषणो और आपसी बातचीत मे जिक्र होने लगा और वही बाते पढाते और सुनाते गये उन्होने माना और उसे आगे बढाया गया नेताओ और समाजिक प्रबुद्ध लोगो के उद्बोधन मे इन बातो की झलक सुनाई देती रही है..
पिछली तीन चार दशको की जेनरेशन ने यही पढा और नकारात्मक का बोध किया.. वो मानने लगे की हा हमारे मे एकता नही है...
क्या सचमूच मे ऐसा था या है...हा परिस्थितियों के बदलाव मे समाज को उस धारा मे जीवन जीने के हालात मे सामजस्य बिठाणे मे समय लगा और वो कही जगह जहां उन्का प्रतिनिधित्व होना था नही हो पाया या भाग नही ले पाये जिससे एक बड़ा गेप आ गया और उसको विरोधी लेखको ने एकता की कमी और पतन से समाज को लुहलाहन करते रहे और कर रहे हैं...
नकरात्मक का दुसरा भाग सकारात्मक भी होता है कभी उस विचार से अपने आप को पढे अपने पुर्वजो को पढे तो यह इस दुनिया के लेखको का कालाजादु आपके सामने आ जायेगा..
लोकतंत्र व्यवस्था मे समाज के रह व्यक्ति ने हर भाग मे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई हैं हर कोने मे अपने आप को पाया है.. आप दस मिन्ट आखें बन्द करके सोचे जिस भाग मे जानना चाहगें वहा आपके समाज का प्रतिनिधित्व करता हुआ कोई ना कोई राहगीर मिलेगा..
ऐसे लोग और मेरे मित्र जब यह कहते हैं की एकता की कमी है तो उन्हे यही कहूंगा भाई अब बस करो हम मे एकता की कमी नही कही ना कही सामंजस्य का अभाव था..
एक बार सकारात्मक सोचो समाज के प्रति आप अपने आप को दुनिया का खुश व्यक्ति मानगें....
सब समाज का सम्मान करे वो भी सम्मान करेगें...
हमारे सामाजिक ठेकेदार भी कमी है, कमी है का ढोल पिट कर उल्लु सिधा करते रहते हैं... बस उन्से उम्मीद की वो कुछ पोजिटीव सोचे.. जय माताजी
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