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बुधवार, 18 जनवरी 2023

जिंदगी एक सफ़र है। साथ चलता है अपनों का प्यार।

आज मातृत्व दिवस हैं और मेरी तरफ से मां के चरणों मे कोटी कोटी वन्दन,

 'सालवे ने जाजे दिकरा' ,जीव रा जतन करजै.
यह शब्द पढ कर आप को भी याद आ गया होगा की यह शब्द हर मां अपने लाडले को देशावर रोजगार पाने के लिए जब मा का लाडला घर से विदा लेता है तो मां अपने लाडले को कहती हैं,  
 हमे मारवाड़ से रोजगार पाने के लिए अपने राज्य से दुसरे राज्य मे जाना पड़ता है तब आवाजाही के लिए बस या ट्रेन का सहारा लिया जाता है और इस तरह की तस्वीर आप ने भी अपने जीवन मे बहूत बार देखी होगी और इस तरह का अनुभव लिया होगा. रोजगार के लिए जब पहली दफा आप घर से निकलते है तो कठिनाई की पहली परीक्षा यह बस या ट्रैन ही करवा देते हैं सिमित साधन की वजह से आप को इस ठुसमठुस वाली स्थिति मे बैठना पड़ता है और इस अनुभव को मेने भी महसुस किया है पर आपके जीवन की पहली कठिनाई को आप जैसे तैसे करके अपने सपनो के शहर मे उतर जाते हैं और फिर गांव की दुनिया से आप शहर की भीड़ भाड़ वाली, स्वार्थपन और दौलतमंन्द वाली जगह पर आ जाते हैं, आप के विचार और मन भी सपनो के शहर मे हिलोरे मारने लगते हैं फिर अाप उस जिन्दगी मे रम जाते हैं कही वर्षो अपने सेठ के साथ हंसी, खुशी, सुख दुःख और कष्ट सह कर आप अपने अनुभव को मजबूत करते हैं और फिर एक दिन आप अपना व्यवसाय शुरू कर देते हैं. आप के जीवन का स्वरुप बदलता है और उसके साथ साथ आप कही लोगो के जीवन को बदलते है. इस तरह की समस्या से उपर उठकर आज राजस्थानी भाई दुनिया के हर कोने मे अपने हुनर और कौशल का डंका बजाते है और पुरी दुनिया उन्हे नमन करती है. 
अन्त मे बस इतना ही कहना चाहता हूं की तस्वीर को शेयर करने से किसी के दिल को ठेस पहूचें तो माफी का हकदार हूं.. 
पर अब वक्त बदला है थोड़ा हमे अपने जीवन के बारे मे भी सतर्क रहना चाहिए बेवजह इस तरह की यात्रा ना करे... और मा के शब्द जीव रा जतन करजै को सही उपयोग करें... इस तरह के दृश्य साचौंर से मम्बुई वाली बसो मे आम हैं.. 

श्रवण चौहान

कैसी झूठी शान। समाज

कैसी झूठी शान... 

तेज और आधुनिकता से भरी जिन्दगी मे कौन किसका होता है, जो मिला जब मिला तब हाय हैलो बोल दिया और चल दिया. जनसंख्या बढी, प्रतिस्पर्धा बढी और रोजगार के संसाधन कम हुए. हम उस कौम से आते हैं जहां एक कमाने वाला और बाकी सब खर्च या खाने वाले मिलेगें ऐसी स्थिति मे आज के समय परिवार कैसे चले. हम झूठी शाने शौकत मे लाखों उड़ा देते हैं, लाखो मयखाने की दीवारों और नजराना मे फेंक देते हैं क्युकी यह थोपित झूठी शान हैं हमारी, हम लाखों का बन्धेज लंहगा बना लेगें क्युकी हमारा पेरवाश हैं.. उफ यह खर्चे और नकरे तो बढे समय पर नकद नही बढी. समय के बदलते मापदडों को हमने अपने विरूद्ध समझा ना हम उसके साथ चले ना हम उसके साथ चलना चाहते हैं हमें आज भी जो मांगने से मिल रही है उसे लड़कर लेने मे शान समझते हैं.. कैसे हम जिद्दी और खडुस हैं. 
समाज की शान और ताकत त्याग और तप हैं और वो होना चाहिए पर बदलते वक्त मे जिस रिवाज को छोड़ना है उसे क्यु गले की गांठ बनाकर चल रहे हैं. 

हर कोई लाखों नही कमाता,बड़ा मुश्किल से परिवार चलता है उस पर भी अगर भगवान नाराज हो जाये तो परिवार क्या खाने के लाले पड़ जाते हैं तब शरूआत होती हैं जिवन जीने की जंग. हम हाथ फैलाते हैं अपनो से, हम अरदास करते हैं चाहने वालों से पर जब भगवान ही रूठा तो कौन है इन्सानी ताकत जो हमारा सहारा बनेगा. 
ऐसी विकट स्थिति  मे महिला को बाहर निकलना पड़ता है जीवन और सन्तान को बचाने के लिए. समाज लांछन लगायेगा. समाज बाते करेगा. समाज क्या क्या नही करेगा वो आप भी जानते हैं और वो सब. 

अफसोस उसे तो जीना है. त्याग का रास्ता कब तक उसे रोकोगे.. क्युकी उसे उसके बच्चे की चित्कार उसे बैठने नही देगी. जब सब जगह से निराशा हाथ लगे तो वो रोजगार के लिए कार्य करेगी वो खराब तो नही होगा पर समाज के मापदंडो मे नीचा होगा. 

धत.. हम रोज संगठन और समाज की बात करते हैं, इतिहास, भुगोल और भविष्य की बात करते हैं.. धत ऐसे संगठनो के जो एक शब्द मे पुरे समाज की ताकत बोलते हैं पर उन्की हकीकत मे पहूंच चंद जिलों मे है.. क्या छोटे भाग पर महिला रोजगार के लिए काम नही हो सकता..ऐसे संगठन क्यु नही बनता जो रोजगार देने की बात करें.. लड़ने और मारने के सिवाय भी रास्ते हैं..

 आज मे दुःखित हूं अजमेर की घटना से ना में सिर्फ बल्कि आम राजपूत को ठेस पहूंची होगी पर क्या करें आखों मे पानी और रोष के सिवाय कल फिर भुल जायेगें... 
यह घटना चेतावनी जागो और आगे बढो.. उन लोगो का कोटी कोटी धन्यवाद जो उस बहिन तक मदद पहुंचाई है.. काश थोड़ा पहले हो जाता तो उन लोगों के तंज नही सुनना पड़ता उस  बहिन को.... उफ दुःखित, चिन्तित
 (किसी की भावनाओं आहत हो तो माफ करना ) 
श्रवण चौहान

भिड़ में खोया इंसान लौट आया है। human life

#भीड़ #मे #खोया #इंसान #लौट #आया #है 

जब से जन्म लिया और समझ आयी तब से यही सिखाया गया, पढाया गया, बोला गया, सुनाया गया, दिखाया गया की ये 21 वी सदी है आगे बढो, दौड़ते रहो, नही तो दुनिया मे पिछे रह जाहोगे. 

इस दौड़ मे हर कोई शामिल हो गया, देश दुनिया का आम इंसान इस रेस का राही बन गया, जो लोग गावों मे रहते थे वो भी आगे बढने की रेस मे शहरो की तरफ भागने लगे गांव खाली से हो गये थे.. 

दौड़ मे यही था की कैसे भी करके आगे बढो येन केन पैसा कमाए उसी पैसो के बल पर तुम्हारी सफलता नापी जायेगी. 

दौड़ इतनी अन्धी हो गयी थी की इसमे सच्चा इंसान इस भीड़ मे खो गया था, हर जगह सफलता के पैमाने सुनाये जाने लगे, आम इसांन ना चाहकर भी इस भीड़ का हिस्सा बन गया था कौन किधर जा रहा था तो कौन किधर आ रहा था, उसका कोई पता नही लग रहा था, हर कोई अपनो से पराया हो रहा था, हर कोई बड़े परिवार से छोटे परिवार मे विश्वास करने लगा था, हर कोई अपने को आगे रखना चाहता था, चाहे सामने वाला मरे या जीये वो अपनी जीत सुनिचित करना चाहता था. 

दौड़ मे परिवार बिछड़े, परिवार मे भाई बिछड़े, बहन,नाना नानी, मामा मामी,काका काकी, बान्धव, कुटुम्ब  सब का संबन्ध एक साकेंतिक मात्र रह गया था बस इंसान को तो सफल होना था. 

भीड़ इतनी थी की मानव जात की क्रद  नही थी ना सुनने वाले, ना दिखने वाले रोज किस्से रोज अखबार और टिवी सक्रिन की सुर्खिया थी, मानवता तार तार थी लोग किसी को बचाने नही अपने आप को आगे बढा रहे थे.. 

भीड़ भौतिक सुख सुविधा के लिए मरे जा रही थी मां बाप के रिस्ते और व्यवहार को भुला रही थी रोज कान खड़े करने वाली खबरे पढी जा रही थी लोग पैसो के लिए क्या क्या नही कर रहे थे.. 

भीड़ ने मान लिया था की अब अगर पिछे रहे तो इस भीड़ मे कुसले जायेगें बस दौड़ो दौड़ो, भागो भागो, 

हर कोई बिजी था, किसी के पास दो वक्त के लिए समय नही था ना परिवार के लिए और ना ही आस पड़ोस मित्र सगे रिस्तेदारो के लिए, बस पैसा ही सब कुछ था... 

कॉर्पोरेट हाउस तो ऐसे जिदां ताबुत थे की बस तुमको तो यह करना पड़ेगा नही तो यह हो जायेगा, तुम पिछे रह जाहोगे, वो हो जायेगा. इसांन को इतना डरा दिया था की इंसान इस भीड़ का सजीव होते हुए निर्जिव प्राणी बन गया था. 

निर्जीव प्राणी बन दर दर की ठोकरे खाने को मजबुर था ना जिने की चाह थी और ना मरने का भय उसे तो उस भीड़ मे काबिल बनना था.. 

लोग कहते थे दुनिया तेज हो गयी अब चंद मिन्ट के लिए नही रूकेगें, दुनिया इतनी विकसित हो गयी है की इंसान को जिदां कर देती है दुनिया एक मिन्ट मे सामने वाले को खत्म कर देती हैं, एक मिन्ट मे सामने वाला कहां छुपा है पता कर देती है, दुनिया आकाश से पाताल और पाताल से गगन तक जा पहूंची हैं की पुछो मत अगर तुम नही दौड़े तो क्या होगा कैसे जिदां रहोगे... 

इस झूठी कल्पना और अधीं दौड़ को एक मामुली वायरस ने रोक दिया विश्व के सब देश खौफजादा है जो शक्तिशाली होने का दंभ भरते थे जो अणु परमाणु रोबोट की बात करते थे वो भगवान के भरोसे बैठे हैं, देश के हर जगह भय व्याप्त है कोई उस से बच नही पा रहा है, कोई इस छोटे से वायरस से सिना तान कर सामने नही आ रहा हैं. 

जो बड़े बड़े शहर पैर रखने की जगह नही थी वो विरान से पड़े हैं लोग घरो की तरफ भाग रहे हैं इस से बचने के लिए महाशक्तियो से नही सिर्फ भगवान के भरोसे है वो चिकित्सा भी लाचार है जो भगवान मे विश्वास कम करती थी वो विकसित का दभं भरती थी. 

हवाई बंद, ट्रेन बंद, बस बंद, गाड़ी बंद, मोल बंद, पब बंद, बड़े बड़े होटले बदं, दुकाने बदं, कारखाने बदं, आलीशान बगलेॉ बदं, बड़ी बड़ी गाड़ीया बदं, शानो शौकत के रास्ते बदं, अमीर का दभं भरने वाले बदं कमरो मे बदं, हर तरफ बदं.

वो भीड़ धिरे धिरे कम हो गयी वो काबिल होने की दौड़ खत्म हो गयी. 

उसी भीड़ मे खोया सच्चा व्यवहार, अपनापन और सरलता का राही इंसान फिर घर की और लौट आया है, वो सुकुन की सांस लेकर बोल रहा है यह सब अधीं दौड़ मिथ्या थी ना संसकृतिं का मान था ना इसांन का.. 

आज भीड़ से लौटा इसांन परिवार के साथ हर पल बिता रहा है, पुराने समय को याद कल रहा है और भुले भगवान को याद कर रहा है और भगवान से अरदास करते हुए कहता है हम तो भोले प्राणी है तुही शक्तिमान तुही सर्वदाता है अब तुमको ही हमे बचाना है... 

भीड़ से लौटा इसांन एकबार फिर आकाश को निहार रहा है और नींद के आगोश मे सो गया... ना टी टी की आवाज, ना प्रदूषण... 

भगवान से इंसान यही कह रहा है अबकी बार बचा ले फिर कभी इसांनियत को मरने नही दुगां...... 

भगवान सबको कुशल मंगल रखे, हम भारतीय जितेगें और दुनिया को रास्ता दिखायेगें की तेज रफ्तार से ज्यादा इसांनियत है...... 

भीड़ मे खौया इसांन लौट आया है.. 

श्रवण चौहान

सोमवार, 16 जनवरी 2023

मारवाड़ का नाश्ता,भोजन। राजस्थान

#घाट, #घें या #राबडी 

जब सूरज देवता अपनी अधिकतम ताकत का अहसास करवा रहे हो और जेठ महिना अपने भारतीय संस्कृति मे जेठ सा सर ढक कर रहने का अहसास करवाये उस समय  इन से बचने के लिए इन्सान कही जतन करता है. 

अभी राजस्थान मे गर्मी जमकर अग्नि बरसा रही है और पंखा, कुलर और वातानुकूलित यंत्र भी इस तेज धुप के सामने हांफते नजर आ रहे हैं. 

वैसे गर्मिया के दिन है तो अंधिकाश बच्चे घर आये हुए है तो कुछ विवाह सिजन या कोई काम से देश आये हुए हैं और वो लोग जो शहरी जीवन के आदी हो गये हैं उन्को अभी गर्मी से बचने के लिए कई जतन करने पड़ रहे हैं. 
वैसे में भी गर्म हवा और तेज का ताप नापने के लिए गांव हूं. 

गर्मी मे व्यक्ति ना तो ज्यादा खा सकता है ना ज्यादा घुम फिर सकता है. 

यह जो तस्वीर है यह राजस्थान और अंधिकाश मारवाड़ मे आज भी घरो मे देखने को मिल जायेगा. जी हां बात कर रहा हूँ मारवाड़ की परंपरागत और सातवीक, सादा और पाचक भोजन 'घाट' या 'घें' और तरलता का रूप हो तो उसे राबड़ी कह सकते हैं. 
 दरअसल मारवाड़ मे बाजरे प्रमुख खाघान्त अनाज माना गया है और यही एक फसल होती है जो हर घर की भोज्य जरूरत को पुरा करती है. बाजरी से बनने वाला सोगरा और साग जग सावे है... और यह ताकतवर भोजन माना गया है सोगरा शरीर की सभी जरूरतो को पुरा करता है. 

बात कर रहे थे घाट  की तो घाट बाजरी से ही बनती है. बाजरी को अधकसरा कर दिया जाता है और उसे किसी ओखली या हमाम मे कुटा जाता है. फिर किसी मिट्टी के बर्तन मे इसे छाछ के साथ चुल्हे पर पकाया जाता है.. पकने तक इसमें लकड़ी का डोयला घुमाया जाता रहता है जिससे उसमे गलेट ना पड़े.. पकने के बाद इसको रख दिया जाता है. 
सुबह इसको आप छाछ, दही या दुध के साथ आराम से खा सकते हैं इसे नाशते के वक्त, भोजन या बेफारा के टाईम या शाम के वक्त दुध के साथ बड़े आराम से जीम सकते हैं. 
यह ठण्डा तासीर का भोज्य है इसके जीमने से आप के पेट मे ठंडक का अहसास होगा, पाचन शक्ति भी बढाता है. और तरलता रूप होने के कारण आप गर्मी मे जीमने से पेट का भारीपन अहसास नही करेगें. 

घाट आजकल कही घरो मे नही के बराबर बनती है इसे एक पुराना और अनपढ लोगो का भोजन माना गया और नये लोगो कही बार मजाक भी करते हैं. घाट को गरीबी से भी जोड़ा गया.. वैसे इसको बनाने की मेहनत ही कम बनाने की वजह हो गयी है.. देसावरी लोग होने के कारण घर घर मे गाय भैंस पालना बन्द कर दिया है उसकी मार आज गावों मे साफ दिखती है.. 

छाछ शहर मे आज आसानी से मिल जायेगी पर अब यह गावों मे मिलना दूभर हो गया है.. बिन छाछ घाट की कल्पना मुश्किल है. 
वैसे आधुनिकता मे अगर कोई इसे तड़का या टेस्ट दे तो यह शहर मे सुबह के वक्त लेने वाला पौष्टिक आहार माना जाने लगेगा.. जैसा ईडली डोसा... 
मैं तो लुफ्त ले रहा हूँ आप भी मारवाड़ पधारे तो एक बार घर पर घाट बनवाई और आनन्द से जीमिये.. 

यह हमे जमीन से जुड़े रहने का आहसास करवाता है और तलीय भोजन से बेहतर है.

मूंगफली की फसल और फायदे।

मूंगफली की फसल और फायदे।  मूँगफली peanut, या groundnut, वानस्पतिक नाम : Arachis hypogaea. https://youtube.com/shorts/PCXDt5vbxd0...