बुधवार, 18 जनवरी 2023

भिड़ में खोया इंसान लौट आया है। human life

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जब से जन्म लिया और समझ आयी तब से यही सिखाया गया, पढाया गया, बोला गया, सुनाया गया, दिखाया गया की ये 21 वी सदी है आगे बढो, दौड़ते रहो, नही तो दुनिया मे पिछे रह जाहोगे. 

इस दौड़ मे हर कोई शामिल हो गया, देश दुनिया का आम इंसान इस रेस का राही बन गया, जो लोग गावों मे रहते थे वो भी आगे बढने की रेस मे शहरो की तरफ भागने लगे गांव खाली से हो गये थे.. 

दौड़ मे यही था की कैसे भी करके आगे बढो येन केन पैसा कमाए उसी पैसो के बल पर तुम्हारी सफलता नापी जायेगी. 

दौड़ इतनी अन्धी हो गयी थी की इसमे सच्चा इंसान इस भीड़ मे खो गया था, हर जगह सफलता के पैमाने सुनाये जाने लगे, आम इसांन ना चाहकर भी इस भीड़ का हिस्सा बन गया था कौन किधर जा रहा था तो कौन किधर आ रहा था, उसका कोई पता नही लग रहा था, हर कोई अपनो से पराया हो रहा था, हर कोई बड़े परिवार से छोटे परिवार मे विश्वास करने लगा था, हर कोई अपने को आगे रखना चाहता था, चाहे सामने वाला मरे या जीये वो अपनी जीत सुनिचित करना चाहता था. 

दौड़ मे परिवार बिछड़े, परिवार मे भाई बिछड़े, बहन,नाना नानी, मामा मामी,काका काकी, बान्धव, कुटुम्ब  सब का संबन्ध एक साकेंतिक मात्र रह गया था बस इंसान को तो सफल होना था. 

भीड़ इतनी थी की मानव जात की क्रद  नही थी ना सुनने वाले, ना दिखने वाले रोज किस्से रोज अखबार और टिवी सक्रिन की सुर्खिया थी, मानवता तार तार थी लोग किसी को बचाने नही अपने आप को आगे बढा रहे थे.. 

भीड़ भौतिक सुख सुविधा के लिए मरे जा रही थी मां बाप के रिस्ते और व्यवहार को भुला रही थी रोज कान खड़े करने वाली खबरे पढी जा रही थी लोग पैसो के लिए क्या क्या नही कर रहे थे.. 

भीड़ ने मान लिया था की अब अगर पिछे रहे तो इस भीड़ मे कुसले जायेगें बस दौड़ो दौड़ो, भागो भागो, 

हर कोई बिजी था, किसी के पास दो वक्त के लिए समय नही था ना परिवार के लिए और ना ही आस पड़ोस मित्र सगे रिस्तेदारो के लिए, बस पैसा ही सब कुछ था... 

कॉर्पोरेट हाउस तो ऐसे जिदां ताबुत थे की बस तुमको तो यह करना पड़ेगा नही तो यह हो जायेगा, तुम पिछे रह जाहोगे, वो हो जायेगा. इसांन को इतना डरा दिया था की इंसान इस भीड़ का सजीव होते हुए निर्जिव प्राणी बन गया था. 

निर्जीव प्राणी बन दर दर की ठोकरे खाने को मजबुर था ना जिने की चाह थी और ना मरने का भय उसे तो उस भीड़ मे काबिल बनना था.. 

लोग कहते थे दुनिया तेज हो गयी अब चंद मिन्ट के लिए नही रूकेगें, दुनिया इतनी विकसित हो गयी है की इंसान को जिदां कर देती है दुनिया एक मिन्ट मे सामने वाले को खत्म कर देती हैं, एक मिन्ट मे सामने वाला कहां छुपा है पता कर देती है, दुनिया आकाश से पाताल और पाताल से गगन तक जा पहूंची हैं की पुछो मत अगर तुम नही दौड़े तो क्या होगा कैसे जिदां रहोगे... 

इस झूठी कल्पना और अधीं दौड़ को एक मामुली वायरस ने रोक दिया विश्व के सब देश खौफजादा है जो शक्तिशाली होने का दंभ भरते थे जो अणु परमाणु रोबोट की बात करते थे वो भगवान के भरोसे बैठे हैं, देश के हर जगह भय व्याप्त है कोई उस से बच नही पा रहा है, कोई इस छोटे से वायरस से सिना तान कर सामने नही आ रहा हैं. 

जो बड़े बड़े शहर पैर रखने की जगह नही थी वो विरान से पड़े हैं लोग घरो की तरफ भाग रहे हैं इस से बचने के लिए महाशक्तियो से नही सिर्फ भगवान के भरोसे है वो चिकित्सा भी लाचार है जो भगवान मे विश्वास कम करती थी वो विकसित का दभं भरती थी. 

हवाई बंद, ट्रेन बंद, बस बंद, गाड़ी बंद, मोल बंद, पब बंद, बड़े बड़े होटले बदं, दुकाने बदं, कारखाने बदं, आलीशान बगलेॉ बदं, बड़ी बड़ी गाड़ीया बदं, शानो शौकत के रास्ते बदं, अमीर का दभं भरने वाले बदं कमरो मे बदं, हर तरफ बदं.

वो भीड़ धिरे धिरे कम हो गयी वो काबिल होने की दौड़ खत्म हो गयी. 

उसी भीड़ मे खोया सच्चा व्यवहार, अपनापन और सरलता का राही इंसान फिर घर की और लौट आया है, वो सुकुन की सांस लेकर बोल रहा है यह सब अधीं दौड़ मिथ्या थी ना संसकृतिं का मान था ना इसांन का.. 

आज भीड़ से लौटा इसांन परिवार के साथ हर पल बिता रहा है, पुराने समय को याद कल रहा है और भुले भगवान को याद कर रहा है और भगवान से अरदास करते हुए कहता है हम तो भोले प्राणी है तुही शक्तिमान तुही सर्वदाता है अब तुमको ही हमे बचाना है... 

भीड़ से लौटा इसांन एकबार फिर आकाश को निहार रहा है और नींद के आगोश मे सो गया... ना टी टी की आवाज, ना प्रदूषण... 

भगवान से इंसान यही कह रहा है अबकी बार बचा ले फिर कभी इसांनियत को मरने नही दुगां...... 

भगवान सबको कुशल मंगल रखे, हम भारतीय जितेगें और दुनिया को रास्ता दिखायेगें की तेज रफ्तार से ज्यादा इसांनियत है...... 

भीड़ मे खौया इसांन लौट आया है.. 

श्रवण चौहान

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