#प्रवासी #आफत #नही #अवसर... Covid time
हम सब के जीवन काल मे ऐसा पहली बार ही हुआ है की अपने घरो से आजीविका कमाने निकले हमारे अपने लोग घर वापस आने के लिए जी तोड़ मेहनत और येन केन रूप से एकबार घर पहूंचना चाहते हैं.
सरकार की परीक्षा
राजस्थान की स्थापना के बाद शायद ही ऐसी कोई सरकार रही होगी जिन्हे इस रूप मे ऐसी वस्तु स्थितियों का सामना करना पड़ रहा होगा, राजस्थान मे करीब हर जिले, गांव कस्बो से लोग रोजगार के लिए देश विदेश जाते हैं और वही रहकर अपने घरो और राज्य को पैसे भेज कर मजबूत करते हैं. वो एक तरफ से सरकारो के लिए कतई बोझ नही बने और जब जब सरकार ने इन प्रवासियों को आर्थिक सहयोग के लिए याद किया है तो दिल खोलकर अपने गांव, जिले और राज्य की तरक्की के लिए सहयोग किया है.
जालोर-सिरोही एक नजर में..
राज्सथान के यह दोनो जिले ऐसे है जिन्में से पशास प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा मे लोग प्रवासी हैं. इन दोनो जिलो की सम्मानता भी है और वो यह की दोनो एक लोकसभा के भाग है और जिसका नतिजा यह है की वर्षो से यह लोकसभा एक पिछड़ा हुआ लोकसभा माना जाता है, सासंद बुटा सिंह से लेकर वर्तमान सासंद जी तक इस लोकसभा के विकास के नाम पर जय माताजी ही मिली है इन जिले को आज भी पिछड़े हुए जिले की श्रेणी मे रखा जाता है उसके पिछे बेसिक सुविधा का ना होना और यह नही होने का कारण हमारी लीडरशिप की योग्यता मे कमी मानना उचित होगा.
जैसा की अब प्रवासी करीब करीब जिलो मे लौट चुके हैं और जिले पर दबाव बढता रहा है उसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं,
कल तक ग्रीन जोन मे गिने जाने वाला जिला अब ओरेन्ज के बाद रेड जोन की तरफ बढने लगा है और इधर हम अपने लोकसभा जिलो के चिकित्सा सुविधा का आकलन करे तो सुविधा 'मोणा मे मुठी' बराबर है मतलब की शुन्य है, ना बड़े अस्पताल है ना बड़े डॉक्टर है ना बड़ी जगह जहां पर बेड की व्यवस्था हो सके, कोरोना मे वेटंिलेटर की आवश्यकता मानी जाती है तो लोकसभा मे कुल मिलाकर 20 मशीन नही होगी, लोकसभा मे वर्तमान सासंद जी जो तीसरा अपना कार्यकाल मे है अब तक कितने बड़े अस्पताल लोकसभा मे लाये यह तो उन्के लोग ही बता सकते हैं.
जालोर सिरोही मे अधिक मात्रा मे लौटे प्रवासी बन्धु जो दो तरह के है उन्मे एक सेठ है और दुसरे श्रमिक बन्धु. इस विपरीत हालातो मे सेठ बन्धु को अपना घर बार चला लेगें पर जो श्रमिक बन्धु है उन्का क्या वो महिने का कमाई घर भेजते थे आज वो भी बन्द है अब इस समस्या का सामना यहा की वतृमान राज्य सरकार को करना पड़ेगा इन बन्धुओ के रोजी रोटी की व्यवस्था करने का जिम्मा अब राज्य सरकार पर है शायद यह पहली बार राज्य सरकार पर बोझ बन रहे वर्ना हमेशा स्वाभिमानी से कमा कर पैसा राज्य मे भेजा है पर अब हालात विपरीत हैं कोरोना की वजह से सब कुछ छोड़ जीव बचाने के घर को लौटे हैं.
समस्या मे समाधान...
जालोर सिरोही समेत राज्य के अधिंकाश जिले मे प्रवासी बन्धु लौटे हैं और कोरोना के डर के साथ साथ बेरोजगारी का डर भी अब लगने लगा है.
अगर यह लोकडाउन की समय सीमा बढती हैं तो बेरोजगारी का आंकड़ा भी अचानक बढ जायेगा, क्युकी एक बेरोजगारी की संख्या वो है जो यहा स्थाई है और दुसरा प्रवासी बन्धुओ का मिलन इस संख्या मे इजाफा कर सकता है.
सरकार इस समस्या से निपटना चाहे तो बेहतर ढगं से प्लानिंग करे तो जो प्रवासी बन्धु बाहरी राज्य मे रहकर व्यापार कौशल, मेहनत, लगन से कमाई करते हैं उसी को इस राज्य मे परखा जाये मतलब की सरकार ऐसे अवसर पैदा करे की प्रवासी बन्धु अपने जिले, राज्य मे ही रहकर रोजगार पाये और पैदा करे जो बाहरी राज्य मे निवेश है उन्हे अपने इधर मोड़े.
सरकार को इसके लिए व्यापक स्तर पर कार्य योजना की जरूरत पड़ेगी ना की मनरेगा जैसे कार्य चला कर.
सरकारी इच्छा शक्ति दिखा कर जो कही वर्षो से हमारे राज्य मे औधोगिक ऐरिये है जैसे 'रिको जोन' ऐसे जगह मे नयी जान डालनी पड़ेगी लाईट, पानी और बेसिक सुविधा का विस्तार करना पड़ेगा, टैक्स मे छुट और यातायात की सुविधा करनी पड़ेगी, ईजी बिजनेस का मोडल तैयार करना पड़ेगा को इतनी बड़ी संख्या मे यह मेन पावर का सही इस्तेमाल हो सकता है.
जैसा की कहा गया है की बड़ी महामारी या घटना के बाद पुरे विश्व मे बहूत कुछ बदल जाता है तो हो सकता है हमारा राज्य इस आफत को अवसर समझ कर कार्य करे तो राजस्थान एक नये युग मे प्रवेश करेगा.
आफत नही अवसर..
कोरोना काल मे सब कुछ रूका सा पड़ा है हर कोई इस कठिन समय के गुजर जाने की प्रतीक्षा मे बैठा है की सब कुछ सही रहते हुए यह काल अपने उपर से बिना किसी को निगले निकल जाये जिससे की परिवार बचा रहे.
जैसे ही सब बुरा वक्त गुजरे तो हम सब जालोर-सिरोही वासियो के लिए कुछ वक्त बैठ कर सोचने की वक्त है.
हमारे जिले करीब सतर साल बाद भी पिछड़े हुए क्यु? हमारे लोकसभा मे आज भी बड़ा कोई अस्पताल क्यु नही? हमारा जिला बिजनेस लोगो के लिए जाना जाता है तो यह सुविधा लोकल स्तर पर क्यु नही ? हमारे जिले के लोग जब नेता प्रवास पर जाते हैं तो फुल मालाओं से लाद देते हैं पर बुरे वक्त मे सब सब कहा छुप गये?? क्या इन नेताओ को सामूहिक प्रयास नही करने चाहिए थे..? क्या अब भी हम चुनाव वक्त जातियों मे बंट जायेगें...? क्या एक आम युवा प्रवासियों के लिए आवाज उठाता रहा हो यह काम इन चुने हुए नेता का नही था...? हजारो रूपये खर्च कर क्यु आना पड़ा??? पास के लिए दर दर क्यु भागना पड़ा???
इन सब सवालों के मन मे दबा रखिये और वक्त आने पर जवाब जरूर मांगना....
हमारी लीडरशिप इस समस्या को आफत ना समझकर अवसर माने और इस दिशा मे अभी से पहल करे तो बहूत कुछ बदल सकता है.
आप सभी प्रवासी बन्धुओ और हम सब मिलकर सरकारी आदेश का पालन करे और कोरोना से बचे...
जय जलन्धरनाथ जी जय सारणेश्वर जी
#जालोर-#सिरोही
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