tourism लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
tourism लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 19 जनवरी 2023

युवा क्यू अटल ब्रिज बहुत जाते है। अहमदाबाद।Atal bridge I River Front Ahmedabad

ये एक ऐसा ब्रिज है जहां पर छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा यू ट्यूब र और इंस्टग्रमाम पर रिल बनाने वाला जाना चाहेगा। 
< class="separator" style="clear: both; text-align: center;">

इस ब्रिज पर सुबह से शाम ओर विशेषकर संध्या काल में पर्यटकों और युवा वर्ग की भीड़ सी लगी रहती है। और शानदार फोटो ग्राफ के साथ साथ लोग रिल बनाते नजर आएंगे।

ब्रिज का उदघाटन देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किया तब से लोगो के लिए अहमदाबाद में देखने के लिए ये अटल ब्रिज खास जगह बन गया है।

इसकी डिजाइन बहुत ही आकर्षक है दूर से देखने पर एक मशली आकर का दिखता है ओर साथ ही साथ इसमें पतंग उत्सव को भी ध्यान में रखते हुए इसके कलर में विभिन्न तरह की प्तंगो के कलर आप को देखने को मिल जाएगा।

ये अच्छे खासे धातु से बनाया गया है इस पर सिर्फ पैदल चलने के लिए है, मोटरसाइकिल या कार नहीं ले जा सकते हो। उसके लिए पार्किंग की व्यवस्था है।

अटल ब्रिज में आप चाय कॉफी का भी आनंद ले सकते है इसके लिए कैफे की सुविधा के साथ साथ नाश्ता की स्टाल भी मिल जाएगी।

अटल ब्रिज रिवर फ्रंट पर बना हुआ है जो दो किनारों को मिलता है। रिवर फ्रंट शाम ओर सुबह में घूमने की अच्छी जगह है। 

अटल ब्रिज के पास में फूलों का गार्डन ओर साथ ही साथ आप नौका विहार का भी आनंद ले सकते है। 

अटल ब्रिज से अहमदाबाद की खूबसूरती में चार चांद लग गए है। 

आप भी जब कभी अहमदाबाद जाए तो जरूर अटल ब्रिज घूम आए।  बस 30 रुपया टिकट देके।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

जय उमिया माताजी। ऊंझा गुजरात। umiya mataji unjha ।

कहते हैं.. कडवा पाटीदार समाज की कुलदेवी मां उमिया को  भगवान शिव ने स्वंय उुजां गुजरात मे विराजमान किया था,  विक्रम संवत 212 में वहां के राजा व्रजपालसिंह ने मदिर का निर्माण करवाया और फिर राजा अवनिपत ने बड़ा सा हवन करवाया था जिसमे करीब सवा लाख नारियल और घी का उपयोग किया गया था.

उसके बाद विक्रम संवत 1122-24 में वेगडा गामी ने वापिस निर्माण करवाया क्युकी उसे अलाउध्दिन खिलजी के सेनापति उूलग खाना ने तोड़ दिया था. 1943 मे पाटीदार समाज ने मंदिर का सम्पूर्ण निर्माण करवाया और उसमे हर पाटीदार घर से हिस्सा लिया गया और उसमे आगेवान श्री रामचन्द्र मनसुख लाल,गायकवाड़ गर्वमेन्ट और पाटड़ी दरबार थे. 1952 से यह ट्रस्ट से संचालित होता हैं, जेठ सुद 2 को यहा उत्सव आयोजित होता है जिसे `हेल खेलना ना हलोतरा' 'भटवारी' नाम से जाने जाते हैं, मा उमिया की अशिम कृपा पाटीदार समाज पर बनी हुई हैं और आज वे धन धान्य से सम्पूर्ण जीवन जीते है, वैसे उूंजा आज कृषि उत्पादो का पुरे देश का केन्द्र माना जाता है और पुरे देश भर से यहा व्यापरी खरीद बेच के लिए आते हैं यहा पर जीरा, सौंफ, राई, तिल जैसे उत्पादो का जोर रहता है. जी हा उूजा मंडी मे आप को गुजरात और राजस्थान के लोग ज्यादा मिलेगें वहा पर अधिकतर दुकाने पाटीदार समाज के लोगो की है और उन्के साथ मे राजस्थान के बाड़मेर, गुड़ामालानी, चोहटन, साचौंर के लोग भी मिल जायेंगे. मा उमिया सब पर अपनी  कृपा बनाये रखे और किसान और व्यापारीयो के चेहरे पर चमक बरकरार रखे. 

#जय #उमिया #माताजी. #Unjha #Umiya #mataji

सोमवार, 16 जनवरी 2023

जब धर्म की हानी हुई तब तब क्षत्रिय ने जीवन बलिदान दिया है। #जय #सोमनाथ ।#हमीर #जी #गोहिल।

#जब #धर्म #की #हानी #हुई #तब #तब #क्षत्रिय #ने #जीवन #बलिदान #दिया #है। #जय #सोमनाथ ।#हमीर #जी #गोहिल।


सौराष्ट्र जिसे सोरठ और काठियावाड़ भी कहते हैं, खंभात और कच्छ की खाई के बीच की भूमि, जहाँ कई वीर क्षत्रियों ने जन्म लिया, कई संतो ने अपने ज्ञान से इस भूमि को पवित्र किया, जहाँ के चारण आज भी बहुत गर्व से सोरठ भूमि की गाथा कहते हैं.

सोरठ भूमि का गोहिलवाड, अमरेली जिले के लाठी में भीमजी गोहिल के यहाँ हमीर जी गोहिल का जन्म हुआ . बचपन से ही बहादुर हमीर जी, एक बार खाना खा रहे थे तब इन्हें इनकी भाभी द्वारा ये पता चला की विदेशी आक्रमण कारी सोमनाथ मंदिर लूटने आ रहे हैं. इनकी भाभी ने ताना मारते हुए कहा, आज सोरठ की भूमि पे कोई भी ऐसा क्षत्रिये खून नही बचा, जो विदेशी आक्रमणकारियों  का सामना करके उनसे सोमनाथ मंदिर की रक्षा कर सके. हमीर गोहिल का क्षत्रिय खून खौल उठा, उनसे ये ताना वर्दास्त नही हुआ, और खाने से उठकर, उन्होंने प्रतिज्ञा ली की जीते जी सोमनाथ किसी विदेशी को लूटने नही दूँगा. भाभी को अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने उसे रोकने की कोशिश भी की पर वो नही रुके, और अपने साथ दुसरे २०० वीर लोगों को लेकर सोमनाथ की तरफ चल पड़े.

रास्ते में एक जगह विश्राम करते समय इनके कान में मरशिया (वीरों के मरने पर गाये जाने वाले गीत) गीत सुनाई दिया, हमीरजी ने देखा एक बूढी माँ गीत गा रही हैं, उन्होंने पास जाकर पूछा आप किसका मर शिया गा रही हो बा, बूढी माँ बोली अपने बेटे का, अभी १५ दिन पहले ही उसका स्वर्गवास हुआ है. हमीर जी ने कहा बा आप अपने पुत्र का मरशिया गा रहे हो उसी तरह मेरा मरशिया गाओगे, मुझे मरने से पहले अपना मरशिया सुनना है.

बा बोली बेटा, ये क्या कह रहे हो ? एक जवान जिन्दा मर्द का  मरशिया गाकर मुझे पाप का भागीदार नही बनना. हमीर जी ने कहा , मैं घर से प्रतिज्ञा लेकर निकला हूँ की जीते जी सोमनाथ विदेशियों को लूटने नही दूंगा, वहां सुल्तान ज़फर की फ़ौज है और यहाँ हम सिर्फ २०० लोग, मरना तो निश्चित है, तो आप बिना किसी संकोच के मरशिया गाओ बा. बा ने कहा सोमनाथ की रक्षा के लिए निकले हो, मैं वहीँ जा रही हूँ, तुझ से पहले पहुचुंगी वहां जाकर देखूंगी की तू किस वीरता से लड़ता है, उस तरह से ही तेरे मरशिया गाऊँगी, और बा सोमनाथ के लिए निकल गयीं.

आगे गिर के जंगल से गुज़रते  समय हमीर जी गोहिल का सामना जंगल में रहने वाले भीलों से हुआ, भीलों को जब ये मालूम हुआ कि ये नौजवान दल सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए इस ओर आया है, तो उन्होंने उनका बड़ा स्वागत किया. भील सरदार वेगडा जी भी अपने ३०० भील बंधुयों के साथ इस दल में शामिल हो गए और उन्होंने भी सोमनाथ की रक्षा की कसम ली. भील सरदार वेगडा जी की बेटी से हमीर जी का विवाह हुआ, और उस दिन वहां बहुत खुशी मनाई गयी.

अगले दिन सब अपने हथियारों सहित सोमनाथ मंदिर, प्रभास तीर्थ की और बढ़ चले. वहां पहुंचकर प्रभास का बाहरी क्षेत्र वेगडा जी ने संभाला और मंदिर का क्षेत्र हमीर जी ने अपने हाथों में लिया.

ज़फर खान की सेना जब प्रभास पहुंची तो उनका सामना पहले वेगडा जी भील से हुआ, वेगडा जी भील और उनके भील सिपाहियों ने जमकर टक्कर ली और तीर कमान से तोपों का सामना किया, पर जफ़र खान ने तोपों के गोले उन पर बरसाना चालू रखा, अंत में सभी भील सिपाही सोमनाथ की रक्षा करते हुए शहीद हुए.

ज़फर खान की सेना भीलों से सामना होने के बाद आगे बढ़ी, यहाँ हमीर जी गोहिल से सामना हुआ, जफ़र खान की सेना बराबर तोपों से गोले बरसाती रही फिर भी हमीर जी गोहिल ने ९ दिनों तक डटकर सामना किया. अंत में हमीर जी ने केशरिया करने का निर्णय किया, और सबको युद्ध रचना समझा दी, सब वीरों ने केशरिया साफा सर पे बांधा और किले के दरवाजे खोल कर सब मैदान में आ गए. सब ने वीरों की तरह मैदान में रण कौशल दिखाया, और जब तक लड़ सकने की एक भी उम्मीद उनके आखरी खून की बूंद में रही वे लड़े, अंत में सिर्फ हमीर जी बचे. ज़फर खान ने अपनी सेना को हमीर जी को चारों और से घेरने का हुक्म दिया, सारी सेना अब हमीर जी को घेर कर उनपर वार करने लगी, और लड़ते लड़ते उस वीर ने भी वहीँ, सोमनाथ की शरण में प्राण त्याग दिए.

उसके बाद ज़फर खान सोमनाथ मंदिर को लूटकर, फिर से उसे ध्वस्त करके अपनी राजधानी लौट गया.

જનની જણતો ભગત જણજે, કા આવા શુરવીર અને કા દાતાર, નહિતર રહેજે વાંજણી, મત ગુમાવીશ તારૂ નુર.

#श्रवण #चौहान #Somnath #temple #Shrawan #Chauhan

मारवाड़ का नाश्ता,भोजन। राजस्थान

#घाट, #घें या #राबडी 

जब सूरज देवता अपनी अधिकतम ताकत का अहसास करवा रहे हो और जेठ महिना अपने भारतीय संस्कृति मे जेठ सा सर ढक कर रहने का अहसास करवाये उस समय  इन से बचने के लिए इन्सान कही जतन करता है. 

अभी राजस्थान मे गर्मी जमकर अग्नि बरसा रही है और पंखा, कुलर और वातानुकूलित यंत्र भी इस तेज धुप के सामने हांफते नजर आ रहे हैं. 

वैसे गर्मिया के दिन है तो अंधिकाश बच्चे घर आये हुए है तो कुछ विवाह सिजन या कोई काम से देश आये हुए हैं और वो लोग जो शहरी जीवन के आदी हो गये हैं उन्को अभी गर्मी से बचने के लिए कई जतन करने पड़ रहे हैं. 
वैसे में भी गर्म हवा और तेज का ताप नापने के लिए गांव हूं. 

गर्मी मे व्यक्ति ना तो ज्यादा खा सकता है ना ज्यादा घुम फिर सकता है. 

यह जो तस्वीर है यह राजस्थान और अंधिकाश मारवाड़ मे आज भी घरो मे देखने को मिल जायेगा. जी हां बात कर रहा हूँ मारवाड़ की परंपरागत और सातवीक, सादा और पाचक भोजन 'घाट' या 'घें' और तरलता का रूप हो तो उसे राबड़ी कह सकते हैं. 
 दरअसल मारवाड़ मे बाजरे प्रमुख खाघान्त अनाज माना गया है और यही एक फसल होती है जो हर घर की भोज्य जरूरत को पुरा करती है. बाजरी से बनने वाला सोगरा और साग जग सावे है... और यह ताकतवर भोजन माना गया है सोगरा शरीर की सभी जरूरतो को पुरा करता है. 

बात कर रहे थे घाट  की तो घाट बाजरी से ही बनती है. बाजरी को अधकसरा कर दिया जाता है और उसे किसी ओखली या हमाम मे कुटा जाता है. फिर किसी मिट्टी के बर्तन मे इसे छाछ के साथ चुल्हे पर पकाया जाता है.. पकने तक इसमें लकड़ी का डोयला घुमाया जाता रहता है जिससे उसमे गलेट ना पड़े.. पकने के बाद इसको रख दिया जाता है. 
सुबह इसको आप छाछ, दही या दुध के साथ आराम से खा सकते हैं इसे नाशते के वक्त, भोजन या बेफारा के टाईम या शाम के वक्त दुध के साथ बड़े आराम से जीम सकते हैं. 
यह ठण्डा तासीर का भोज्य है इसके जीमने से आप के पेट मे ठंडक का अहसास होगा, पाचन शक्ति भी बढाता है. और तरलता रूप होने के कारण आप गर्मी मे जीमने से पेट का भारीपन अहसास नही करेगें. 

घाट आजकल कही घरो मे नही के बराबर बनती है इसे एक पुराना और अनपढ लोगो का भोजन माना गया और नये लोगो कही बार मजाक भी करते हैं. घाट को गरीबी से भी जोड़ा गया.. वैसे इसको बनाने की मेहनत ही कम बनाने की वजह हो गयी है.. देसावरी लोग होने के कारण घर घर मे गाय भैंस पालना बन्द कर दिया है उसकी मार आज गावों मे साफ दिखती है.. 

छाछ शहर मे आज आसानी से मिल जायेगी पर अब यह गावों मे मिलना दूभर हो गया है.. बिन छाछ घाट की कल्पना मुश्किल है. 
वैसे आधुनिकता मे अगर कोई इसे तड़का या टेस्ट दे तो यह शहर मे सुबह के वक्त लेने वाला पौष्टिक आहार माना जाने लगेगा.. जैसा ईडली डोसा... 
मैं तो लुफ्त ले रहा हूँ आप भी मारवाड़ पधारे तो एक बार घर पर घाट बनवाई और आनन्द से जीमिये.. 

यह हमे जमीन से जुड़े रहने का आहसास करवाता है और तलीय भोजन से बेहतर है.

राजपूत कभी कमजोर नहीं हुआ।

#कौन #राजपूत #कमजोर हुआ.?


एक वक्त ऐसा आया जब कही लेखको ने राजपूत समाज को नकारात्मक की मुर्ति बना दिया और उसमे पतन और एकता की कमी जैसे शब्द हर लेख, कहानी या भाषणो और आपसी बातचीत मे जिक्र होने लगा और वही  बाते पढाते  और सुनाते गये उन्होने माना और उसे आगे बढाया गया नेताओ और समाजिक प्रबुद्ध लोगो के उद्बोधन मे इन बातो की झलक सुनाई देती रही है..

 पिछली तीन चार दशको की जेनरेशन ने यही पढा और नकारात्मक का बोध किया.. वो मानने लगे की हा हमारे मे एकता नही है... 

क्या सचमूच मे ऐसा था या है...हा परिस्थितियों के बदलाव मे समाज को उस धारा मे जीवन जीने के हालात मे सामजस्य बिठाणे मे समय लगा और वो कही जगह जहां उन्का प्रतिनिधित्व होना था नही हो पाया या भाग नही ले पाये जिससे एक बड़ा गेप आ गया और उसको विरोधी लेखको ने एकता की कमी और पतन से समाज को लुहलाहन करते रहे और कर रहे हैं... 

नकरात्मक का दुसरा भाग सकारात्मक भी होता है कभी उस विचार से अपने आप को पढे अपने पुर्वजो को पढे तो यह इस दुनिया के लेखको का कालाजादु आपके सामने आ जायेगा.. 
लोकतंत्र व्यवस्था मे समाज के रह व्यक्ति ने हर भाग मे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई हैं हर कोने मे अपने आप को पाया है.. आप दस मिन्ट आखें बन्द करके सोचे जिस भाग मे जानना चाहगें वहा आपके समाज का प्रतिनिधित्व करता हुआ कोई ना कोई राहगीर मिलेगा.. 

ऐसे लोग और मेरे मित्र जब यह कहते हैं की एकता की कमी है तो उन्हे यही कहूंगा भाई अब बस करो हम मे एकता की कमी नही कही ना कही सामंजस्य का अभाव था.. 
एक बार सकारात्मक सोचो समाज के प्रति आप अपने आप को दुनिया का खुश व्यक्ति मानगें.... 
सब समाज का सम्मान करे वो भी सम्मान करेगें...

हमारे सामाजिक ठेकेदार भी कमी है, कमी है का ढोल पिट कर उल्लु सिधा करते रहते हैं... बस उन्से उम्मीद की वो कुछ पोजिटीव सोचे.. जय माताजी

रविवार, 8 जनवरी 2023

#कभी #अपनी #वीरता #की #कहानी #कहने #वाला #आज #रो #रहा #है #अपनी #बदहाली #पर। #जालोर_किल

#कभी #अपनी #वीरता #की #कहानी #कहने #वाला #आज #रो #रहा #है #अपनी #बदहाली #पर। #जालोर_किला आज के राजपूतों ने सिर्फ बोतले फोड़ी है! जब से पढ़ना शुरू किया तब से जिला जालोर सीखा है वहीं एक और जालोर नाम से कहीं ना कही एक जुड़ाव सा लगता है और उसका कारण जिस समाज और जाती धर्म में जन्म लिया उसके पुरोधा का रिश्ता कही ना कही इस नाम से रहा है। करीब दिन के ग्यारह बज रहे थे और सुबह सिरे मंदिर दर्शन कर नीचे आने की थकान भी लग रही थी पर कही ना कहीं ऐसा लग रहा था कि अभी आज कि यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है ऐसा कुछ है जो अभी अधूरा है और उसके बिना ये यात्रा पूरी नहीं हो सकती । में जालोर शहर की सड़क पर खड़ा था पर में जैसे ही थोड़ा उपर देखने की कोशिश करता तो ऐसा लग रहा था कि कोई ना कोई मुझे बुला रहा है और तुझे आना ही होगा। आखिर कार दोस्तो ने कहा कि अगर वहा नहीं गए तो ये यात्रा अधूरी है। अब पक्का कर दिया था कि भले ही अभी 1000 सीढ़ियां उतर कर आए है पर अभी सिरे की तरह सिर मोहर के जैसे खड़े स्वर्णगिरी का वो अभेद किला, वो किला जो सदियों से आज भी खड़ा अपने वीरता कि कहानी बयां कर रहा है और हर किसी को अपने वीरता की कहानी बता रहा था। हम तिलक मार्केट से एक संकरी गली से यात्रा सरू की और एक बेहद संकरी गली से पूछते पूछते हम आगे बढ़ रहे थे और अफसोस हो रहा था कि जो मिलो दूर से अपनी सैकड़ों वर्षो से पहचान बता रहा हो उसके देखने आने वाले को जाने का रास्ता पूछना पड़े। थोड़ी दूर शहर की गलियों को पार करते ही फिर हमे पूछना पड़ा की क्या इधर से कोई किले का रास्ता जाता है तो दूर बैठी एक महिला ने अंगुली से इशारा किया और हम समझ गए की उधर जाना है। जैसे ही नजर उधर गई ओर पहली चिढ़ी पर पैर रखा तो अपने आप को मन धिकार रहा था कि हम केसे वसंज है जो अपने पूर्वजों की कभी सुध भी नहीं लेते है और ऐसे जिनका पूरा इतिहास वीरता, शौर्य और जन सेवा,रक्षा में जीवन त्याग करने में भरा पड़ा हो। हर एक सीढ़ी अपनी दुर्दशा बता रही थी। में भी अब अपने ऊपर से प्रशासन पर इस बदहाली का ठीकरा फोड़ रहा था। 

 बेहद खराब, उबड़ खाबड़ रास्ता और गंदगी से भरा रास्ता को पार करते हुए हम सबसे पहले "सूरज पोल" पहुंचे जो अब एक जर्जर हालत में थी और उसकी दीवारों पर आजकल के इशकजादो ने कोयलों से अपने नाम से दीवारें भर दी थी, ये वो पोल है जिस पर किले का प्रथम द्वार माना जाता है जिस पर सुरक्षा का पहला जिम्मा होता है ओर गर्व होता है पर आज अपनी बदहाली पर रो रही थी। पोल के उपर हिस्से में कभी दुश्मनों को छक्के छुड़ाने वाली तोप झाड़ियों में पड़ी थी और मन्न ही मन कह रही थी कि जिसका समय होता है उसकी कीमत होती है बाकी कोई पूछता तक नहीं। इस जर्जर, और गंदगी आलम के साथ हमको "ध्रुव पोल, चांद पोल" यही कहानी कह रही थी कि अब हमारी कोई सुध लेने वाला नहीं है । हम 1345 चीढ़ीया चड कर आखिर उस सबसे ऊंचाई वाले जगह पर आ गए जहां से हम सब वर्षो से इंतज़ार कर रहे थे और रोज गर्व भी करते है। "मामा लाजे भाटिया और कुल लजे चौहान" जैसे प्रसिद्ध वीर दोहे इसी जगह के है। करीब 11 वी सदी में कीर्ति पाल चौहान ने इस किले को अपने आधिपत्य में लिया और वीरता की कहानी गढ़ी गई। इन्हीं के पीढ़ी में काका कन्हदेव और "वीर वीरमदे सोनगरा" जैसे वीर हुए और उस वक़्त के निर्लज, क्रूर आक्रमणकारी खिलजी से लोहा लिया था और अपनी आन बान शान और राष्ट्र धर्म की रक्षा के लिए हजारों वीर योधो के साथ युद्ध कर अपने आप को त्याग दिया था पर कभी समझोता अपने पूर्वजों के नियम उसूल से नहीं किया। राई रा भाव राते बिता वो भी यही किला था। आज जब इतने वीरता भरे किले में प्रवेश किया तो अपने ओर अपने समाज ओर धर्म प्रेमी लोगो पर गुस्सा आ रहा था। गुस्सा इस सरकार के उस विभाग पर आ रहा था जो अपने नाम के हिसाब से ही कार्य करता है। किले में गंदगी, दीवारों पर नाम, पुरानी वस्तु को कबाड़ में फेंका गया।वहीं पड़ी सड़ रही है कोई सुध लेने वाला नहीं है। राजा मान सिंह और रानी का महल रो रहे थे अपने ऐसे हालात पर और उसकी पुष्टि कर रहा था उस के द्वार पर लगा पुरातत्व विभाग का बोर्ड जो इस हालत का साक्ष्य दे रहा था क्युकी उसका नाम भी साफ नहीं पढ़ पा रहे थे। किले के उपर महादेव मंदिर , चामुंड मंदिर, जैन मंदिर और भेरव जी के मंदिर मानो ये कह रहे थे कि अब अगर ज्यादा देर की तो कोई और यहां पर आ जाएगा और तुमरी पीढ़ियों को शायद हम भी ना दिखे। जहा कोना मिला वहा अतिक्रमण हो रहा है ।हर जगह मानो जैसे एक अभियान के तहत हो रहा हो। पर सब मौन है। 

शायद सब कुछ बित जाने पर जगेंगे जैसा हमेशा होता है। हम तो जीमेदर है साथ ही साथ ये पुरातत्व विभाग उतना ही खलनायक रोल में है जितना कि उस वक़्त में कोई आक्रमण करने वाला दुश्मन होगा, कोई किसी प्रकार का रख रखाव नहीं है। सब कबाड़ बन गए। कुछ जगह दीवारें गिरने की कगार पर है पर ये विभाग भी शायद उसका मानो इंतज़ार कर रहा हो। उसी और एक आशापुरा का मंदिर बन रहा है सोचा चलो कुछ अच्छा हो रहा पर जब जानकारी इकठ्ठा की तो एक बड़ा धक्का लगा कि उस मंदिर को कोई एक परिवार अपने श्रद्धा के हिसाब से बना रहा है। अरे हम तो जालोर सिरोही पाली अजमेर ओर पूरे भारत में कितने चौहान परिवार है क्या हम सब एक मा आशापुरा का मंदिर नहीं बना सकते पर अफसोस ना तो कोई किले आता है और ना किसी को पता हम तो अपने नाम के पीछे चौहान, गाड़ी के पीछे, कंकू पत्री या कहीं और सिंह लगाने में खुश है। हम वीरता के गाने गावरा कर अपनी झूठी शान में अपने आप को राजपूत हिन्दू मान कर अपने मन को खुश करते है। भेरूजी के भोपा जी ने भेरूजी के स्वभाव के हिसाब से बड़े कड़े ओर तीखे शब्दों में किले पर किस तरह किस किस ने अतिक्रमण किया उसका पूरा वृतांत सुनाया ओर अंत में इतना ही कहा कि में यहां वर्षो से हूं पर कोई राजपूत यहां नहीं दिखते है और जाते जाते इतना कहा कि राजपूतों ने तो बोतले फोड़ी है बाकी इतिहास को कोई देखभाल नहीं होता सब मौन ओर सोए हुए है। पर अंत में यह भी कहा कि आज का युवा पढ़ रहा है और ऐसे कार्यों के लिए जागरूक भी हो रहा है। अपने समाज को जगहों। अरे कभी अपने उस वीर योद्धा की तरह अडिग खड़ा उस किले पर जाकर तो आइए फिर मेरी तरह आप को अफसोस और झूठी शान करने में शर्मनदगी ओर दुख होगा। मेरी तो आप सब बंधुओ से एक ही प्राथना है आप जिस पर घमंड,गर्व करते है कभी तो उसकी सुध लो और पता करो हमे क्या करना था और क्या अब कर सकते है। माफ़ करना, ऐ विशाल किला तेरी इस दुर्दशा के कोई सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो हम और वो सब है जो वीरता, इतिहास का ढोल पीटने में कोई कमी नहीं रखते है और जो पास सबूत है उसकी हम कदर नहीं करते । आप को अगर कुछ भी सही लगा हो तो शेयर करे। एक बार जरूर पधारे.... #जालोर #किला #Jalore_fort
https://www.niharikatimes.com/rajasthan/jalore-fort-54054421.htmlhttps://www.niharikatimes.com/rajasthan/jalore-fort-54054421.html

मूंगफली की फसल और फायदे।

मूंगफली की फसल और फायदे।  मूँगफली peanut, या groundnut, वानस्पतिक नाम : Arachis hypogaea. https://youtube.com/shorts/PCXDt5vbxd0...