रविवार, 8 जनवरी 2023

जय मां आशापुरा। नाडोल पाली राजस्थान

#जय #मां #आशापुरा।

आज नव वर्ष 2023 के शुभ बेला पर हम सब मा आशापुरा के दरबार से आप सब के लिए मंगलकामना करते है। आप सब को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई। 

आज प्रभात मंगल आरती में नव वर्ष की शुरुआत की जिसमे ढोल, नगाड़े,शंख, थाली की गर्जना के साथ हिंदुमय माहोल में मा आशापुरा के दर्शन लाभ मित्रो संग लिए। 

मा आशापुरा जो की पूरे भारत में चौहान कुल गोत्र की कुल देवी मा है। मा आशापुरा चौहान,देवडा, खींची, हाड़ा,निर्वाण, सेप्ता,रावत , जडेजा कुल की मां आशापुरा नाडोल पाली में विराजमान है।

शाकम्भरी के चौहान राजवंश की कुलदेवी है । नैणसी की ख्यात का उल्लेख है कि लाखणसी चौहान को नाडौल का राज्य आशापूरा देवी मा की कृपा से मिला । तदनन्तर चौहान इसे अपनी कुलदेवी मानने लगे । आशा पूर्ण करने वाली देवी आशापूरा के नाम से विख्यात हुई।

लाखणसी  या लक्ष्मण नामक चौहान शासक द्वारा नाडौल में आशापूरा देवी का भव्य मन्दिर बनवाया गया जहाँ  बड़ी संख्या में श्रद्धालु जाते हैं । आशापूरा गाँव की एक पहाड़ी पर देवी आशापूरा का प्राचीन स्थल है जँहा देवी को मीठा भोग लगता हैं । भाद्रपद और चैत्रमास की अष्टमी को विशेेष उत्सव होता है । सैकड़ो वर्षों से आशापूरा देवी की बहुत मान्यता है।

आशापूरा माता शाकम्भरी माता का ही रूप है। शाकम्भरी देवी चौहान राजपूतों की कुलदेवी है। एक शिलालेख के अनुसार विक्रम संवत 1030 में सिंहराज चौहान सांभर का सम्राट बना।  सिंहराज के भाई का नाम लक्ष्मण (लाखणसी चौहान) था।

लाखणसी एक दिन सांभर त्याग कर अपनी पत्नी व सेवक के साथ पुष्कर पहुँचा।  पुष्कर तीर्थ स्नान कर अरावली पर्वतों को पार करके सप्तशत की ओर प्रस्थान किया। रात्रि में नीलकण्ठ महादेव के मन्दिर में आश्रय लिया। प्रातः पुजारी ने परिचय पूछा तो लाखणसी ने कहा, “महात्मन मैं सांभर नरेश सिंहराज का अनुज लक्ष्मण हूँ।  मैं अपने बाहुबल से कुछ बनना चाहता हूँ।” पुजारी के कहने पर वहाँ के राजा ने लक्ष्मण को नगर अध्यक्ष बना दिया।

 लाखणसी का पराक्रम और माँ की कृपा

एक दिन मेदों ने सप्तशत पर आक्रमण कर दिया।  भीषण युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने अपनी तलवार का जौहर दिखाया। अकेले लक्ष्मण ने सैकडों मेदों को मार डाला।  उसकी वीरता से प्रसन्न होकर राजा ने आशीर्वाद दिया कि “माँ तुम्हारी सम्पूर्ण आशा पूर्ण करे, तुम्हारी कीर्ति दिग्दिगन्त तक फैले।” अंत में मेद थक कर भाग गए। लेकिन लक्ष्मण भी गंभीर रूप से आहत हुआ।

माता ने रात में स्वप्न में लक्ष्मण को दर्शन दिये और आशीर्वाद दिया “पुत्र निराश मत हो, प्रातः समय मालव प्रदेश से असंख्य घोड़े इधर आएंगे, तुम उन पर केसर मिश्रित जल छिटक देना जिससे उनका प्राकृतिक रंग बदल जायेगा और तुम उनकी एक अजय सेना तैयार कर लेना।” माँ की असीम कृपा से लक्ष्मण नाडोल का शासक हुआ। डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार इन घोड़ों की संख्या 12000 थी और मुथा नेणसी ने यह संख्या 18000 बतायी।

कुलदेवी ने लक्ष्मण की आशाओं की पूर्ति की, अतः यही शाकम्भरी देवी नाडौल की आशापूरा माता के नाम से विख्यात हुई। आशापूरा  माता के मन्दिर में मन्दिर में चैत्र और आश्विन के नवरात्रि के अतिरिक्त माघ शुक्ल द्वितीया को भी पर्व मनाया जाता है। इस मन्दिर का निर्माण लाखणसी चौहान ने किया, इसलिये इस दिन देवी महोत्सव और लाखणसी चौहान का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

मंदिर व्यवस्था वहा की कमेटी द्वारा देखी जाती है जिसका चुनाव द्वारा चयन होता है। भक्त जन जो भी भेंट देते है उस से नव निर्माण करवाया जाता है। इस नव निर्माण में बालिका छात्रावास निर्माण का भी प्लान है। रुकने और भोजन की अच्छी व्यवस्था है।

नाडौल रानी स्टेशन से 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ यात्रियों के ठहरने और भोजन की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। माताजी के मन्दिर के सामने महाराव लाखणसी की  प्रतिमा स्थापित है व बांयी ओर महाराव लाखणसी द्वारा निर्मित बावड़ी विद्यमान है।  जिसके द्वार पर गंगा मैया की प्रतिमा स्थापित है। मन्दिर का प्रांगण विशाल व रमणीय है।

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